कबीर अमृतवाणी, कबीर जी के प्रसिद्द दोहे हिंदी अर्थ सहित Sant Kabir ke Popular Dohe KABIR MEDITATION


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Title : कबीर अमृतवाणी, कबीर जी के प्रसिद्द दोहे हिंदी अर्थ सहित Sant Kabir ke Popular Dohe KABIR MEDITATION
Category Name: Lord Shiv Bhajan
Author Name: The Absolute Truth
Publishing Year: 2021-02-24 13:45:47
Music Lenth: 00:08:52 Min
Size: 7 MB
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Songs Info : This is very beautiful bhajan कबीर अमृतवाणी, कबीर जी के प्रसिद्द दोहे हिंदी अर्थ सहित Sant Kabir ke Popular Dohe KABIR MEDITATION that will hear you become more energized many such Bhajan are available in Bhaktigaane, listen to yourself and also tell others and share them together to help us

Songs Info :बहुत ही सुन्दर भजन हैं जिसे सुनकर आप भाव विभोर हो जायेंगे ऐसे ही बहुत सारे भजनो का संग्रह हैं भक्तिगाने में मिलेगा , खुद भी सुने और दुसरो को भी सुनाये और साथ में शेयर कर हमें सहयोग प्रदान करे

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कबीर अपनी लेखनी में हम जैसे सांसारिक लोगो को परम सत्य की तरफ मोड़ने के लिए लिखते रहे और हम उन्हें एक कवि की तरह पढ़ते रहे ! कभी समझा नहीं की वो किस रहस्य की बात कर रहे है हमे कहाँ ले जाने की तरफ इशारा कर रहे थे आइये जो हम बचपन में कबीर को सिर्फ 5 या 10 नंबर का प्रश्न आता था एग्जाम में उसके नंबर पाने के लिए याद करते थे ! आज हम उस दृष्टिकोण को बदलने की कोशिश करेंगे ! aj आपको समझ में आएगा की वो तो किसी और रहश्य की ही बात कर रहे थे
कबीर अध्यात्म के वो अथाह समुन्दर है जिन्हे आप जितना समझते जायेंगे उतना ही सत्य के करीब जाते जायेंगे ! कबीर को कवि तरह नहीं बल्कि उस परमपिता के अंश की तरह पढ़ना शुरू कीजिये आपका जीवन दृष्टिकोण ही बदल जायेगा
माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।
यहाँ कबीर हमे समझाने की कोशिश कर रहे की पूरा देश हाथ में माला के मनको को फेर कर उस परमपिता परमात्मा से मिलने के लिए मन के स्वभाव को बदलने की कोशिश में लगा है लेकिन कबीर हमे समझाते है की हाथ में माला के मनके फेरने से ये चंचल मन काबू में नहीं आएगा इसके लिए कुछ और उपाय है

एक जगह वो लिखते है !
माला जपु न कर जपु और मुख से कहु राम !
राम हमारा हमें जपे और हम पायो विश्राम !
यहाँ कबीर हमे अपनी सूरत शब्द योग साधना के बारे में समझा रहे है की मैं हाथ में लेकर माला नहीं जपत्ता हु न ही माला के मनके गिनता हु यहाँ सूरत शब्द योग की एक अवस्था जहाँ पर जैसे ही मैं ध्यान को अंदर करता हु तो पाते है की मन तो आटोमेटिक ही परमपिता को बिना ध्यान लगाए जप रहा है !

एक जगह वो लिखते है
जब मैं था तब वो नाहि अब वो है मैं नाहि !
प्रेम गली इतनी शंकरी इसमें दो न समाही !
अब पढ़ने में ये साधारण सा प्रेम का कोई प्रतीक लगता है लेकिन ये असल में वो अवस्था है जिसे हर आध्यात्मिक साधक पाना चाहता है ! जो सालो के अथक प्रयास के बाद में समझ में आती है की उस परमपिता से मिलने में सबसे बड़ी रूकावट तो हम खुद ही है ! खुद से मतलब जो हम इस शरीर को असल समझ कर इससे प्यार करते है ! वो कहते है वो हरि तभी मिलेगा जहाँ आप खुद को मिटा दोगे और सिर्फ वो रह जायेगा !

दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार,
तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार।
यहाँ कबीर हमें समझा रहे है की ये मनुष्य जन्म हमे बहुत सारी अलग योनियों में दुःख झेलने के बाद मिला है इसका परम लक्ष्य सिर्फ और सिर्फ उस असीम शक्ति के साथ लीन होना है ! अगर हम इस मनुष्य जनम में भी उस हरि से मिलने से चूक गए तो दोबारा पता नहीं ये मौका मिलेगा या नहीं !

कहत सुनत सब दिन गए, उरझि न सुरझ्या मन।
कही कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन।
यहाँ कबीर हमारे चंचल मन के लिए चोट कर रहे है और कहना चाहते है की हम दिन भर अध्यात्म को कह सुन रहे है लेकिन हमारा चंचल मन अभी भी सांसारिक चीजों में उलझा हुआ है अभी भी उसके अंदर वो वेदना पैदा नहीं हुई वो वैसा ही है जैसा पहले दिन था !

कबीर सुता क्या करे, जागी न जपे मुरारी ।
एक दिन तू भी सोवेगा, लम्बे पाँव पसारी ।।
यहाँ कबीर हमारे आलस में सोये रहने की आदत पर चोट कर रहे है और कह रहे है की सो कर क्या बनेगा क्यों नहीं जागता और उस परमपिता का ध्यान करता ! एक दिन ऐसा आ जायेगा जब हमेशा के लिए सो जायेगा वो मृत्यु की तरह इशारा कर रहे है की जब तक जीवित हो जाग कर उसे जप लो !
एक कवि अपनी कल्पनाओ को कलम से संझो कर हमारे सामने रखते है लेकिन कबीर ने जिस परम् सत्य को पाया उनकी सारी लेखनी उस परम मार्ग पर चलने के लिए खुद को तैयार करने या वो खुद जो मार्ग में देख रहे थे और अंतत परम सत्य का योग सब कुछ एक एक शब्द सत्य है ! वो कवि नहीं परम सत्य थे

आज हमने कबीर को थोड़ा सा समझने की कोशिश की जो की नाकाफी है कबीर अध्यात्म के वो अथाह समुन्दर है जिन्हे आप जितना समझते जायेंगे उतना ही सत्य के करीब जाते जायेंगे ! कबीर को कवि तरह नहीं बल्कि उस परमपिता के अंश की तरह पढ़ना शुरू कीजिये आपका जीवन दृष्टिकोण ही बदल जायेगा !

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