श्रीमदभगवदगीता एकादश अध्याय सभी श्लोक || Shrimad Bhagwad Geeta Chapter-11 All Shlok

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Lyrics Name:श्रीमदभगवदगीता एकादश अध्याय सभी श्लोक
Album Name:Shrimad Bhgwad Geeta Mahakavya
Published Year:2017





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अर्जुन उवाच
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम्।
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

अर्जुन बोले —
केवल मेरेपर कृपा करनेके लिये ही
आपने जो परम गोपनीय अध्यात्मतत्त्व जाननेका वचन कहा?
उससे मेरा यह मोह नष्ट हो गया है।

भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया।
त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम्।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

हे कमलनयन
सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति
और प्रलय मैंने विस्तारपूर्वक आपसे ही सुना है
और आपका अविनाशी माहात्म्य भी सुना है।

एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर।
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

हे पुरुषोत्तम
आप अपनेआपको जैसा कहते हैं?
यह वास्तवमें ऐसा ही है।
हे परमेश्वर आपके ईश्वरसम्बन्धी
रूपको मैं देखना चाहता हूँ।

मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो।
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयाऽत्मानमव्ययम्।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

हे प्रभो
मेरे द्वारा आपका वह परम ऐश्वर रूप देखा जा सकता है —
ऐसा अगर आप मानते हैं तो
हे योगेश्वर आप अपने उस
अविनाशी स्वरूपको मुझे दिखा दीजिये।

श्री भगवानुवाच
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

श्रीभगवान् बोले —
हे पृथानन्दन अब मेरे अनेक तरहके?
अनेक वर्णों और आकृतियोंवाले
सैकड़ोंहजारों दिव्यरूपोंको तू देख।

पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्िवनौ मरुतस्तथा।
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याऽश्चर्याणि भारत।।11
॥ श्लोक का अर्थ ॥

हे भरतवंशोद्भव
अर्जुन तू बारह आदित्योंको?
आठ वसुओंको?
ग्यारह रुद्रोंको और
दो अश्विनीकुमारोंको तथा उनचास मरुद्गणोंको देख।
जिनको तूने पहले कभी देखा नहीं? ऐसे बहुतसे आश्चर्यजनक रूपोंको भी तू देख।

इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम्।
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

हे नींदको
जीतनेवाले अर्जुन
मेरे इस शरीरके एक देशमें चराचरसहित
सम्पूर्ण जगत्को अभी देख ले।
इसके सिवाय तू और भी जो
कुछ देखना चाहता है? वह भी देख ले।

न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा।
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

तू अपनी इस आँखसे
अर्थात् चर्मचक्षुसे मेरेको देख ही नहीं सकता।
इसलिये मैं तुझे दिव्य चक्षु देता हूँ?
जिससे तू मेरी ईश्वरसम्बन्धी सामर्थ्यको देख।

सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः।
दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

सञ्जय बोले —
हे राजन् ऐसा कहकर फिर
महायोगेश्वर भगवान् श्रीकृष्णने
अर्जुनको परम ऐश्वररूप दिखाया।

अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम्।
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

जिसके अनेक मुख और नेत्र हैं? अनेक तहरके अद्भुत दर्शन हैं? अनेक दिव्य आभूषण हैं और हाथोंमें उठाये हुए अनेक दिव्य आयुध हैं तथा जिनके गलेमें दिव्य मालाएँ हैं? जो दिव्य वस्त्र पहने हुए हैं? जिनके ललाट तथा शरीरपर दिव्य चन्दन आदि लगा हुआ है? ऐसे सम्पूर्ण आश्चर्यमय? अनन्तरूपवाले तथा चारों तरफ मुखवाले देव(अपने दिव्य स्वरूप) को भगवान्ने दिखाया।

दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम्।
सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम्।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

जिसके अनेक मुख और नेत्र हैं? अनेक तहरके अद्भुत दर्शन हैं? अनेक दिव्य आभूषण हैं और हाथोंमें उठाये हुए अनेक दिव्य आयुध हैं तथा जिनके गलेमें दिव्य मालाएँ हैं? जो दिव्य वस्त्र पहने हुए हैं? जिनके ललाट तथा शरीरपर दिव्य चन्दन आदि लगा हुआ है? ऐसे सम्पूर्ण आश्चर्यमय? अनन्तरूपवाले तथा चारों तरफ मुखवाले देव(अपने दिव्य स्वरूप) को भगवान्ने दिखाया।

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

अगर आकाशमें
एक साथ हजारों सूर्य उदित हो जायँ?
तो भी उन सबका प्रकाश मिलकर उस महात्मा
(विराट्रूप परमात्मा) के प्रकाशके समान शायद ही हो।

तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

उस समय
अर्जुनने देवोंके देव भगवान्के शरीरमें
एक जगह स्थित अनेक प्रकारके
विभागोंमें विभक्त सम्पूर्ण जगत्को देखा।

ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

भगवान्के विश्वरूपको देखकर अर्जुन बहुत चकित हुए
और आश्चर्यके कारण उनका शरीर रोमाञ्चित हो गया।
वे हाथ जोड़कर विश्वरूप
देवको मस्तकसे प्रणाम करके बोले।

अर्जुन उवाच
पश्यामि देवांस्तव देव देहे
सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान्।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ
मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान्।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

अर्जुन बोले —
हे देव मैं आपके शरीरमें सम्पूर्ण देवताओंको?
प्राणियोंके विशेषविशेष समुदायोंको?
कमलासनपर बैठे हुए ब्रह्माजीको? शङ्करजीको?
सम्पूर्ण ऋषियोंको और सम्पूर्ण दिव्य सर्पोंको देख रहा हूँ।

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं
पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम्।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं
पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

हे विश्वरूप हे विश्वेश्वर
आपको मैं अनेक हाथों? पेटों?
मुखों और नेत्रोंवाला तथा सब
ओरसे अनन्त रूपोंवाला देख रहा हूँ।
मैं आपके न आदिको?
न मध्यको और न अन्तको ही देख रहा हूँ।

किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च
तेजोराशिं सर्वतोदीप्तिमन्तम्।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ता
द्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

मैं आपको किरीट? गदा? चक्र? (तथा शङ्ख और पद्म) धारण किये हुए देख रहा हूँ। आपको तेजकी राशि? सब ओर प्रकाश करनेवाले? देदीप्यमान अग्नि तथा सूर्यके समान कान्तिवाले? नेत्रोंके द्वारा कठिनतासे देखे जानेयोग्य और सब तरफसे अप्रमेयस्वरूप देख रहा हूँ।

अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य
मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रम्
स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

आपको मैं आदि?
मध्य और अन्तसे रहित?
अनन्त प्रभावशाली? अनन्त भुजाओंवाले?
चन्द्र और सूर्यरूप नेत्रोंवाले?
प्रज्वलित अग्निके समान मुखोंवाले और
अपने तेजसे संसारको संतप्त करते हुए देख रहा हूँ।

द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि
व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः।
दृष्ट्वाऽद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं
लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

हे महात्मन्
यह स्वर्ग और पृथ्वीके बीचका अन्तराल
और सम्पूर्ण दिशाएँ एक आपसे ही परिपूर्ण हैं।
आपके इस अद्भुत और
उग्ररूपको देखकर तीनों लोक व्यथित
(व्याकुल) हो रहे हैं।

अमी हि त्वां सुरसङ्घाः विशन्ति
केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः
स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

वे ही देवताओंके समुदाय आपमें प्रविष्ट हो रहे हैं। उनमेंसे कई तो भयभीत होकर हाथ जोड़े हुए आपके नामों और गुणोंका कीर्तन कर रहे हैं। महर्षियों और सिद्धोंके समुदाय कल्याण हो मङ्गल हो ऐसा कहकर उत्तमउत्तम स्तोत्रोंके द्वारा आपकी स्तुति कर रहे हैं।

रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या
विश्वेऽश्िवनौ मरुतश्चोष्मपाश्च।
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा
वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

जो ग्यारह रुद्र? बारह आदित्य? आठ वसु? बारह साध्यगण? दस विश्वेदेव और दो अश्विनीकुमार? उनचास मरुद्गण? सात पितृगण तथा गन्धर्व? यक्ष? असुर और सिद्धोंके समुदाय हैं? वे सभी चकित होकर आपको देख रहे हैं।

रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं
महाबाहो बहुबाहूरुपादम्।
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं
दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाऽहम्।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

हे महाबाहो
आपके बहुत मुखों
और नेत्रोंवाले? बहुत भुजाओं? जंघाओं और चरणोंवाले? बहुत उदरोंवाले?
बहुत विकराल दाढ़ोंवाले महान् रूपको देखकर सब प्राणी व्यथित हो रहे हैं
तथा मैं भी व्यथित हो रहा हूँ।

नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं
व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्।
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा
धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

हे विष्णो आपके अनेक देदीप्यमान वर्ण हैं? आप आकाशको स्पर्श कर रहे हैं? आपका मुख फैला हुआ है? आपके नेत्र प्रदीप्त और विशाल हैं। ऐसे आपको देखकर भयभीत अन्तःकरणवाला मैं धैर्य और शान्तिको भी प्राप्त नहीं हो रहा हूँ।

दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि
दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि।
दिशो न जाने न लभे च शर्म
प्रसीद देवेश जगन्निवास।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

आपके प्रलयकालकी अग्निके समान प्रज्वलित और दाढ़ोंके कारण विकराल (भयानक) मुखोंको देखकर मुझे न तो दिशाओंका ज्ञान हो रहा है और न शान्ति ही मिल रही है। इसलिये हे देवेश हे जगन्निवास आप प्रसन्न होइये।

अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः
सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः।
भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथाऽसौ
सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

हमारे मुख्य योद्धाओंके सहित भीष्म? द्रोण और वह कर्ण भी आपमें प्रविष्ट हो रहे हैं। राजाओंके समुदायोंके सहित धृतराष्ट्रके वे ही सबकेसब पुत्र आपके विकराल दाढ़ोंके कारण भयंकर मुखोंमें बड़ी तेजीसे प्रविष्ट हो रहे हैं। उनमेंसे कईएक तो चूर्ण हुए सिरोंसहित आपके दाँतोंके बीचमें फँसे हुए दीख रहे हैं।

वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति
दंष्ट्राकरालानि भयानकानि।
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु
संदृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

हमारे मुख्य योद्धाओंके सहित भीष्म? द्रोण और वह कर्ण भी आपमें प्रविष्ट हो रहे हैं। राजाओंके समुदायोंके सहित धृतराष्ट्रके वे ही सबकेसब पुत्र आपके विकराल दाढ़ोंके कारण भयंकर मुखोंमें बड़ी तेजीसे प्रविष्ट हो रहे हैं। उनमेंसे कईएक तो चूर्ण हुए सिरोंसहित आपके दाँतोंके बीचमें फँसे हुए दीख रहे हैं।

यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः
समुद्रमेवाभिमुखाः द्रवन्ति।
तथा तवामी नरलोकवीरा
विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

जैसे नदियोंके बहुतसे जलके प्रवाह स्वाभाविक ही समुद्रके सम्मुख दौड़ते हैं? ऐसे ही वे संसारके महान् शूरवीर आपके प्रज्वलित मुखोंमें प्रवेश कर रहे हैं।

यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा
विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः।
तथैव नाशाय विशन्ति लोका
स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

जैसे पतंगे मोहवश अपना नाश करनेके लिये बड़े वेगसे दौड़ते हुए प्रज्वलित अग्निमें प्रविष्ट होते हैं? ऐसे ही ये सब लोग मोहवश अपना नाश करनेके लिये ही बड़े वेगसे दौड़ते हुए आपके मुखोंमें प्रविष्ट हो रहे हैं।

लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ता
ल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः।
तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं
भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

आप अपने प्रज्वलित मुखोंद्वारा सम्पूर्ण लोकोंका ग्रसन करते हुए
उन्हों चारों ओरसे बारबार चाट रहे हैं
और हे विष्णो आपका उग्र प्रकाश अपने तेजसे
सम्पूर्ण जगत्को परिपूर्ण करके सबको तपा रहा है।

आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो
नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद।
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं
न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

मुझे यह बताइये कि उग्ररूपवाले आप कौन हैं
हे देवताओंमें श्रेष्ठ आपको नमस्कार हो।
आप प्रसन्न होइये।
आदिरूप आपको मैं तत्त्वसे जानना चाहता हूँ
क्योंकि मैं आपकी प्रवृत्तिको नहीं जानता।

श्री भगवानुवाच
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो
लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे
येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

श्रीभगवान् बोले —
मैं सम्पूर्ण लोकोंका क्षय करनेवाला बढ़ा हुआ काल हूँ
और इस समय मैं इन सब लोगोंका संहार करनेके लिये यहाँ आया हूँ।
तुम्हारे प्रतिपक्षमें जो योद्धालोग खड़े हैं? वे सब तुम्हारे युद्ध किये बिना भी नहीं रहेंगे।

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व
जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव
निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

इसलिये तुम युद्धके लिये खड़े हो जाओ
और यशको प्राप्त करो
तथा शत्रुओंको जीतकर धनधान्यसे सम्पन्न राज्यको भोगो।
ये सभी मेरे द्वारा पहलेसे ही मारे हुए हैं।
हे सव्यसाचिन् तुम निमित्तमात्र बन जाओ।

द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च
कर्णं तथाऽन्यानपि योधवीरान्।
मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा
युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

द्रोण? भीष्म?
जयद्रथ और कर्ण
तथा अन्य सभी मेरे द्वारा मारे हुए
शूरवीरोंको तुम मारो।
तुम व्यथा मत करो
और युद्ध करो।
युद्धमें तुम निःसन्देह वैरियोंको जीतोगे।

सञ्जय उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य
कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी।
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं
सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

सञ्जय बोले —
भगवान् केशवका यह वचन सुनकर भयसे कम्पित हुए
किरीटी अर्जुन हाथ जोड़कर नमस्कार करके
और अत्यन्त भयभीत होकर
फिर प्रणाम करके सगद्गदं वाणीसे भगवान् कृष्णसे बोले।

अर्जुन उवाच
स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या
जगत् प्रहृष्यत्यनुरज्यते च।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति
सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

अर्जुन बोले — हे अन्तर्यामी भगवन् आपके नाम? गुण? लीलाका कीर्तन करनेसे यह सम्पूर्ण जगत् हर्षित हो रहा है और अनुराग(प्रेम) को प्राप्त हो रहा है। आपके नाम? गुण आदिके कीर्तनसे भयभीत होकर राक्षसलोग दसों दिशाओंमें भागते हुए जा रहे हैं और सम्पूर्ण सिद्धगण आपको नमस्कार कर रहे हैं। यह सब होना उचित ही है।

कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्
गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे।
अनन्त देवेश जगन्निवास
त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

हे महात्मन् गुरुओंके भी गुरु और ब्रह्माके भी आदिकर्ता आपके लिये (वे सिद्धगण) नमस्कार क्यों नहीं करें क्योंकि हे अनन्त हे देवेश हे जगन्निवास आप अक्षरस्वरूप हैं आप सत् भी हैं? असत् भी हैं,और सत्असत्से पर भी जो कुछ है? वह भी आप ही हैं।

त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण
स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम
त्वया ततं विश्वमनन्तरूप।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

आप ही आदिदेव
और पुराणपुरुष हैं
तथा आप ही इस संसारके परम आश्रय हैं|
आप ही सबको जाननेवाले?
जाननेयोग्य और परमधाम हैं।
हे अनन्तरूप आपसे ही सम्पूर्ण संसार व्याप्त है।

वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः
प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः
पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

आप ही वायु? यमराज? अग्नि? वरुण? चन्द्रमा?
दक्ष आदि प्रजापति
और प्रपितामह (ब्रह्माजीके भी पिता) हैं।
आपको हजारों बार नमस्कार हो नमस्कार हो
और फिर भी आपको बारबार नमस्कार हो नमस्कार हो

नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते
नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं
सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

हे सर्व
आपको आगेसे नमस्कार हो
पीछेसे नमस्कार हो
सब ओरसे ही नमस्कार हो
हे अनन्तवीर्य अमित विक्रमवाले
आपने सबको समावृत कर रखा है
अतः सब कुछ आप ही हैं।

सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं
हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।
अजानता महिमानं तवेदं
मया प्रमादात्प्रणयेन वापि।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

आपकी महिमा और स्वरूपको न जानते हुए मेरे सखा हैं ऐसा मानकर मैंने प्रमादसे अथवा प्रेमसे हठपूर्वक (बिना सोचेसमझे) हे कृष्ण हे यादव हे सखे इस प्रकार जो कुछ कहा है और हे अच्युत हँसीदिल्लगीमें? चलतेफिरते? सोतेजागते? उठतेबैठते? खातेपीते समयमें अकेले अथवा उन सखाओं? कुटुम्बियों आदिके सामने मेरे द्वारा आपका जो कुछ तिरस्कार किया गया है? वह सब अप्रमेयस्वरूप आपसे मैं क्षमा करवाता हूँ।

यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि
विहारशय्यासनभोजनेषु।
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं
तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

आपकी महिमा और स्वरूपको न जानते हुए मेरे सखा हैं ऐसा मानकर मैंने प्रमादसे अथवा प्रेमसे हठपूर्वक (बिना सोचेसमझे) हे कृष्ण हे यादव हे सखे इस प्रकार जो कुछ कहा है और हे अच्युत हँसीदिल्लगीमें? चलतेफिरते? सोतेजागते? उठतेबैठते? खातेपीते समयमें अकेले अथवा उन सखाओं? कुटुम्बियों आदिके सामने मेरे द्वारा आपका जो कुछ तिरस्कार किया गया है? वह सब अप्रमेयस्वरूप आपसे मैं क्षमा करवाता हूँ।

पितासि लोकस्य चराचरस्य
त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो
लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

आप ही
इस चराचर संसारके पिता हैं?
आप ही पूजनीय हैं
और आप ही गुरुओंके महान् गुरु हैं।
हे अनन्त प्रभावशाली भगवन्
इस त्रिलोकीमें आपके समान भी दूसरा कोई नहीं है?
फिर अधिक तो हो ही कैसे सकता है

तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं
प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम्।
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः
प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

इसलिये शरीरसे लम्बा पड़कर स्तुति करनेयोग्य
आप ईश्वरको मैं प्रणाम करके प्रसन्न करना चाहता हूँ।
जैसे पिता पुत्रके?
मित्र मित्रके और पति पत्नीके अपमानको सह लेता है?
ऐसे ही हे देव आप मेरे द्वारा किया गया अपमान सहनेमें समर्थ हैं।

अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा
भयेन च प्रव्यथितं मनो मे।
तदेव मे दर्शय देव रूपं
प्रसीद देवेश जगन्निवास।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

मैंने ऐसा रूप पहले कभी नहीं देखा।
इस रूपको देखकर मैं हर्षित हो रहा हूँ
और (साथहीसाथ) भयसे मेरा मन अत्यन्त व्यथित हो रहा है।
अतः आप मुझे अपने उसी देवरूपको (सौम्य विष्णुरूपको)
दिखाइये। हे देवेश हे जगन्निवास आप प्रसन्न होइये।

किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त
मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव।
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन
सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

मैं आपको
वैसे ही किरीटधारी? गदाधारी
और हाथमें चक्र लिये हुए देखना चाहता हूँ।
इसलिये हे सहस्रबाहो विश्वमूर्ते
आप उसी चतुर्भुजरूपसे हो जाइये।

श्री भगवानुवाच
मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं
रूपं परं दर्शितमात्मयोगात्।
तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं
यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

श्रीभगवान् बोले —
हे अर्जुन मैंने प्रसन्न होकर
अपनी सामर्थ्यसे यह अत्यन्त श्रेष्ठ? तेजोमय?
सबका आदि और
अनन्त विश्वरूप तुझे दिखाया है?
जिसको तुम्हारे सिवाय पहले किसीने नहीं देखा है।

न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै
र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः।
एवंरूपः शक्य अहं नृलोके
द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

हे कुरुप्रवीर मनुष्यलोकमें
इस प्रकारके विश्वरूपवाला
मैं न वेदोंके पढ़नेसे? न यज्ञोंके अनुष्ठानसे? न दानसे?
न उग्र तपोंसे और
न मात्र क्रियाओंसे
तेरे (कृपापात्रके)
सिवाय और किसीके द्वारा देखा जाना शक्य हूँ।

मा ते व्यथा मा च विमूढभावो
दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम्।
व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं
तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

यह इस प्रकारका मेरा घोररूप देखकर
तेरेको व्यथा नहीं होनी चाहिये
और मूढ़भाव भी नहीं होना चाहिये।
अब निर्भय और प्रसन्न मनवाला होकर
तू फिर उसी मेरे इस
(चतुर्भुज) रूपको अच्छी तरह देख ले।

सञ्जय उवाच
इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा
स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः।
आश्वासयामास च भीतमेनं
भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

सञ्जय बोले —
वासुदेवभगवान्ने अर्जुनसे ऐसा कहकर
फिर उसी प्रकारसे अपना रूप (देवरूप) दिखाया
और महात्मा श्रीकृष्णने पुनः सौम्यवपु (द्विभुजरूप)
होकर इस भयभीत अर्जुनको आश्वासन दिया।

श्री भगवानुवाच
सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम।
देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

श्रीभगवान् बोले —
मेरा यह जो रूप तुमने देखा है?
इसके दर्शन अत्यन्त ही दुर्लभ हैं।
इस रूपको देखनेके लिये देवता भी नित्य लालायित रहते हैं।

नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया।
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

जिस प्रकार तुमने मुझे देखा है?
इस प्रकारका (चतुर्भुजरूपवाला)
मैं न तो वेदोंसे? न तपसे?
न दानसे और
न यज्ञसे ही देखा जा सकता हूँ।

भक्त्या त्वनन्यया शक्यमहमेवंविधोऽर्जुन।
ज्ञातुं दृष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

परन्तु हे
शत्रुतापन अर्जुन
इस प्रकार (चतुर्भुजरूपवाला)
मैं अनन्यभक्तिसे ही तत्त्वसे जाननेमें?
सगुणरूपसे देखनेमें और प्राप्त करनेमें शक्य हूँ।

मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

हे पाण्डव
जो मेरे लिये ही कर्म करनेवाला?
मेरे ही परायण और मेरा ही भक्त है
तथा सर्वथा आसक्तिरहित
और प्राणिमात्रके साथ निर्वैर है?
वह भक्त मेरेको प्राप्त हो जाता है।

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