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श्रीमदभगवदगीता त्रयोदश अध्याय सभी श्लोक || Shrimad Bhagwad Geeta Chapter-13 All Shlok

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Lyrics Name:श्रीमदभगवदगीता त्रयोदश अध्याय सभी श्लोक
Album Name:Shrimad Bhgwad Geeta Mahakavya
Published Year:2017



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अर्जुन उवाच
प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च।
एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

अर्जुन ने कहा —
हे केशव मैं?
प्रकृति और पुरुष? क्षेत्र
और क्षेत्रज्ञ तथा ज्ञान
और ज्ञेय को जानना चाहता हूँ।।

श्री भगवानुवाच
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

श्रीभगवान् ने कहा —
हे कौन्तेय यह शरीर क्षेत्र कहा जाता है
और इसको जो जानता है?
उसे तत्त्वज्ञ जन? क्षेत्रज्ञ कहते हैं।।

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

हे भारत
तुम समस्त क्षेत्रों में
क्षेत्रज्ञ मुझे ही जानो।
क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है?
वही (वास्तव में) ज्ञान है ?
ऐसा मेरा मत है।।

तत्क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत्।
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे श्रृणु।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

इसलिये? वह क्षेत्र जो है
और जैसा है तथा जिन विकारों वाला है?
और जिस (कारण) से जो (कार्य) हुआ है
तथा वह (क्षेत्रज्ञ) भी जो है
और जिस प्रभाव वाला है?
वह संक्षेप में मुझसे सुनो।।

ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्।
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्िचतैः।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

(क्षेत्रक्षेत्रज्ञ के विषय में)
ऋषियों द्वारा विभिन्न
और विविध छन्दों में बहुत प्रकार से गाया गया है?
तथा सम्यक् प्रकार से निश्चित किये हुये
युक्तियुक्त ब्रह्मसूत्र के पदों द्वारा
(अर्थात् ब्रह्म के सूचक शब्दों द्वारा) भी (वैसे ही कहा गया है)।।

महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

पंच महाभूत? अहंकार? बुद्धि?
अव्यक्त (प्रकृति)? दस इन्द्रियाँ?
एक मन? इन्द्रियों
के पाँच विषय।।

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतनाधृतिः।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

इच्छा? द्वेष? सुख? दुख?
संघात (स्थूलदेह)?
चेतना (अन्तकरण की चेतन वृत्ति)
तथा धृति इस प्रकार यह
क्षेत्र विकारों के सहित संक्षेप में कहा गया है।।

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

अमानित्व? अदम्भित्व?
अहिंसा? क्षमा?
आर्जव? आचार्य की सेवा? शुद्धि?
स्थिरता और आत्मसंयम।।

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

इन्द्रियों के विषय के प्रति वैराग्य?
अहंकार का अभाव?
जन्म? मृत्यु? वृद्धवस्था?
व्याधि और दुख में दोष दर्शन৷৷.।।

असक्ितरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

आसक्ति
तथा पुत्र? पत्नी?
गृह आदि में अनभिष्वङ्ग
(तादात्म्य का अभाव)
और इष्ट और अनिष्ट
की प्राप्ति में समचित्तता।।

मयि चानन्ययोगेन भक्ितरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

अनन्ययोग के द्वारा
मुझमें अव्यभिचारिणी
भक्ति एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव
और (असंस्कृत) जनों के
समुदाय में अरुचि।।

अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोन्यथा।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

अध्यात्मज्ञान में नित्यत्व
अर्थात् स्थिरता तथा तत्त्वज्ञान
के अर्थ रूप परमात्मा का दर्शन?
यह सब तो ज्ञान कहा गया है?
और जो इससे विपरीत है? वह अज्ञान है।।

ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते।
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

मैं उस
ज्ञेय वस्तु को स्पष्ट कहूंगा
जिसे जानकर मनुष्य अमृतत्व को प्राप्त करता है।
वह ज्ञेय है अनादि? परम ब्रह्म?
जो न सत् और
न असत् ही कहा जा सकता है।।

सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

वे (परमात्मा)
सब जगह हाथों
और पैरोंवाले?
सब जगह नेत्रों? सिरों
और मुखोंवाले तथा
सब,जगह कानोंवाले हैं।
वे संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित हैं।

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

वे (परमात्मा)
सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे रहित हैं
और सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषयोंको प्रकाशित करनेवाले हैं
आसक्तिरहित हैं और सम्पूर्ण संसारका भरणपोषण करनेवाले हैं
तथा गुणोंसे रहित हैं और
सम्पूर्ण गुणोंके भोक्ता हैं।

अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्।
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

वे परमात्मा स्वयं विभागरहित होते हुए
भी सम्पूर्ण प्राणियोंमें विभक्तकी तरह स्थित हैं।
वे जाननेयोग्य परमात्मा ही सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाले?
उनका भरणपोषण करनेवाले और संहार करनेवाले हैं।

ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

वह परमात्मा
सम्पूर्ण ज्योतियोंका भी ज्योति
और अज्ञानसे अत्यन्त परे कहा गया है।
वह ज्ञानस्वरूप? जाननेयोग्य?
ज्ञान(साधनसमुदाय) से प्राप्त करनेयोग्य
और सबके हृदयमें विराजमान है।

इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

इस प्रकार क्षेत्र? ज्ञान
और ज्ञेयको संक्षेपसे कहा गया।
मेरा भक्त इसको तत्त्वसे जानकर
मेरे भावको प्राप्त हो जाता है।

प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान्।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

प्रकृति और पुरुष — दोनोंको ही तुम अनादि समझो और विकारों तथा गुणोंको भी प्रकृतिसे ही उत्पन्न समझो। कार्य और करणके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको उत्पन्न करनेमें प्रकृति हेतु कही जाती है और सुखदुःखोंके भोक्तापनमें पुरुष हेतु कहा जाता है।

कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते।
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

प्रकृति और पुरुष — दोनोंको ही तुम अनादि समझो और विकारों तथा गुणोंको भी प्रकृतिसे ही उत्पन्न समझो। कार्य और करणके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको उत्पन्न करनेमें प्रकृति हेतु कही जाती है और सुखदुःखोंके भोक्तापनमें पुरुष हेतु कहा जाता है।

पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्।
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

प्रकृतिमें स्थित पुरुष ही
प्रकृतिजन्य गुणोंका भोक्ता बनता है
और गुणोंका सङ्ग ही उसके ऊँचनीच
योनियोंमें जन्म लेनेका कारण बनता है।

उपद्रष्टाऽनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

यह पुरुष प्रकृति(शरीर) के साथ सम्बन्ध रखनेसे उपद्रष्टा? उसके साथ मिलकर सम्मति? अनुमति देनेसे अनुमन्ता? अपनेको उसका भरणपोषण करनेवाला माननेसे भर्ता? उसके सङ्गसे सुखदुःख भोगनेसे भोक्ता? और अपनेको उसका स्वामी माननेसे महेश्वर बन जाता है। परन्तु स्वरूपसे यह पुरुष परमात्मा कहा जाता है। यह देहमें रहता हुआ भी देहसे पर (सम्बन्धरहित) ही है।

य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैःसह।
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

इस प्रकार पुरुषको
और गुणोंके सहित प्रकृतिको
जो मनुष्य अलगअलग जानता है?
वह सब तरहका बर्ताव करता हुआ
भी फिर जन्म नहीं लेता।

ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना।
अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

कई मनुष्य ध्यानयोगके द्वारा?
कई सांख्ययोगके द्वारा और
कई कर्मयोगके द्वारा
अपनेआपसे अपनेआपमें परमात्मतत्त्वका अनुभव करते हैं।

अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वाऽन्येभ्य उपासते।
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

दूसरे मनुष्य
इस प्रकार (ध्यानयोग? सांख्ययोग? कर्मयोग?
आदि साधनोंको) नहीं जानते?
केवल (जीवन्मुक्त महापुरुषोंसे) सुनकर उपासना करते हैं?
ऐसे वे सुननेके परायण मनुष्य भी मृत्युको तर जाते हैं।

यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन स्थावर
और जंगम जितने भी प्राणी पैदा होते हैं?
उनको तुम क्षेत्र और
क्षेत्रज्ञके संयोगसे उत्पन्न हुए समझो।

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

जो नष्ट होते हुए
सम्पूर्ण प्राणियोंमें परमात्माको नाशरहित
और समरूपसे स्थित देखता है?
वही वास्तवमें सही देखता है।

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।
न हिनस्त्यात्मनाऽऽत्मानं ततो याति परां गतिम्।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

क्योंकि सब जगह
समरूपसे स्थित ईश्वरको समरूपसे देखनेवाला
मनुष्य अपनेआपसे अपनी हिंसा नहीं करता?
इसलिये वह परमगतिको प्राप्त हो जाता है।

प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः।
यः पश्यति तथाऽऽत्मानमकर्तारं स पश्यति
॥ श्लोक का अर्थ ॥

जो सम्पूर्ण
क्रियाओंको सब प्रकारसे प्रकृतिके द्वारा
ही की जाती हुई देखता है
और अपनेआपको अकर्ता देखता
(अनुभव करता) है? वही यथार्थ देखता है।

यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

जिस कालमें
साधक प्राणियोंके अलगअलग
भावोंको एक प्रकृतिमें ही स्थित देखता है
और उस प्रकृतिसे ही उन सबका विस्तार देखता है?
उस कालमें वह ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है।

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

हे कुन्तीनन्दन
यह पुरुष स्वयं अनादि
और गुणोंसे रहित होनेसे अविनाशी परमात्मस्वरूप ही है।
यह शरीरमें रहता हुआ भी न
करता है और न लिप्त होता है।

यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथाऽऽत्मा नोपलिप्यते।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

जैसे सब जगह
व्याप्त आकाश अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे
कहीं भी लिप्त नहीं होता?
ऐसे ही सब जगह परिपूर्ण आत्मा
किसी भी देहमें लिप्त नहीं होता।

यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

हे भरतवंशोद्भव
अर्जुन जैसे एक ही
सूर्य सम्पूर्ण संसारको प्रकाशित करता है?
ऐसे ही क्षेत्री (क्षेत्रज्ञ? आत्मा)
सम्पूर्ण क्षेत्रको प्रकाशित करता है।

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा।
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

इस प्रकार
जो ज्ञानरूपी नेत्रसे
क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके अन्तर(विभाग)
को तथा कार्यकारणसहित प्रकृतिसे स्
वयंको अलग जानते हैं?
वे परमात्माको प्राप्त हो जाते हैं।

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