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श्रीमदभगवदगीता चतुर्दश अध्याय सभी श्लोक || Shrimad Bhagwad Geeta Chapter-14 All Shlok

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Lyrics Name:श्रीमदभगवदगीता चतुर्दश अध्याय सभी श्लोक
Album Name:Shrimad Bhgwad Geeta Mahakavya
Published Year:2017



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श्री भगवानुवाच
परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्।
यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

श्रीभगवान् बोले —
सम्पूर्ण ज्ञानोंमें उत्तम
और पर ज्ञानको मैं फिर कहूँगा?
जिसको जानकर सबकेसब मुनिलोग
इस संसारसे मुक्त होकर
परमसिद्धिको प्राप्त हो गये हैं।

इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः।
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

इस ज्ञानका
आश्रय लेकर जो मनुष्य
मेरी सधर्मताको प्राप्त हो गये हैं?
वे महासर्गमें भी पैदा नहीं होते
और महाप्रलयमें भी व्यथित नहीं होते।

मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम्।
संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

हे भरतवंशोद्भव
अर्जुन मेरी मूल प्रकृति तो उत्पत्तिस्थान है
और मैं उसमें जीवरूप गर्भका स्थापन करता हूँ।
उससे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है।

सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

हे कुन्तीनन्दन
सम्पूर्ण योनियोंमें प्राणियोंके
जितने शरीर पैदा होते हैं?
उन सबकी मूल प्रकृति तो माता है
और मैं बीजस्थापन करनेवाला पिता हूँ।

सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

हे महाबाहो
प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले
सत्त्व? रज और तम —
ये तीनों गुण अविनाशी
देहीको देहमें बाँध देते हैं।

तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्।
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

हे पापरहित
अर्जुन उन गुणोंमें सत्त्वगुण निर्मल (स्वच्छ)
होनेके कारण प्रकाशक और निर्विकार है।
वह सुख और ज्ञानकी
आसक्तिसे (देहीको) बाँधता है।

रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

हे कुन्तीनन्दन
तृष्णा और आसक्तिको पैदा करनेवाले
रजोगुणको तुम रागस्वरूप समझो।
वह कर्मोंकी आसक्तिसे शरीरधारीको बाँधता है।

तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

हे भरतवंशी
अर्जुन सम्पूर्ण देहधारियोंको
मोहित करनेवाले तमोगुणको
तुम अज्ञानसे उत्पन्न होनेवाला समझो।
वह प्रमाद? आलस्य और
निद्राके द्वारा देहधारियोंको बाँधता है।

सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

हे भरतवंशोद्भव
अर्जुन सत्त्वगुण सुखमें
और रजोगुण कर्ममें लगाकर
मनुष्यपर विजय करता है
तथा तमोगुण ज्ञानको ढककर एवं
प्रमादमें भी लगाकर मनुष्यपर विजय करता है।

रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

हे भरतवंशोद्भव
अर्जुन रजोगुण और त
मोगुणको दबाकर सत्त्वगुण? सत्त्वगुण
और तमोगुणको दबाकर रजोगुण?
वैसे ही सत्त्वगुण और र
जोगुणको दबाकर तमोगुण बढ़ता है।

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते।
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

जब इस
मनुष्यशरीरमें सब
द्वारों(इन्द्रियों और अन्तःकरण) में प्रकाश
(स्वच्छता) और ज्ञान
(विवेक) प्रकट हो जाता है?
तब जानना चाहिये कि सत्त्वगुण बढ़ा हुआ है।

लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

हे भरतवंशमें
श्रेष्ठ अर्जुन रजोगुणके बढ़नेपर
लोभ? प्रवृत्ति? कर्मोंका आरम्भ? अ
शान्ति और स्पृहा —
ये वृत्तियाँ पैदा होती हैं।

अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च।
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

हे कुरुनन्दन
तमोगुणके बढ़नेपर अप्रकाश?
अप्रवृत्ति? प्रमाद और मोह —
ये वृत्तियाँ भी पैदा होती हैं।

यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्।
तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

जिस समय सत्त्वगुण बढ़ा हो?
उस समय यदि
देहधारी मनुष्य मर जाता है?
तो वह,उत्तमवेत्ताओंके
निर्मल लोकोंमें जाता है।

रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते।
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

रजोगुणके बढ़नेपर
मरनेवाला प्राणी मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है
तथा तमोगुणके बढ़नेपर
मरनेवाला मूढ़योनियोंमें जन्म लेता है।

कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्।
रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

(विवेकी पुरुषोंने)
शुभकर्मका तो सात्त्विक
निर्मल फल कहा है?
राजस कर्मका फल दुःख कहा है
और तामस कर्मका फल अज्ञान (मूढ़ता) कहा है।

सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च।
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

सत्त्वगुणसे ज्ञान
और रजोगुणसे लोभ
आदि ही उत्पन्न होते हैं
तमोगुणसे प्रमाद? मोह
एवं अज्ञान भी उत्पन्न होता है।

ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

सत्त्वगुणमें स्थित
मनुष्य ऊर्ध्वलोकोंमें जाते हैं
रजोगुणमें स्थित मनुष्य
मृत्युलोकमें जन्म लेते हैं
और निन्दनीय तमोगुणकी वृत्तिमें
स्थित मनुष्य अधोगतिमें जाते हैं।

नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

जब विवेकी (विचारकुशल)
मनुष्य तीनों गुणोंके
सिवाय अन्य किसीको कर्ता नहीं देखता
और अपनेको गुणोंसे पर अनुभव करता है?
तब वह मेरे स्वरूपको प्राप्त हो जाता है।

गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्।
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

देहधारी (विवेकी मनुष्य)
देहको उत्पन्न करनेवाले
इन तीनों गुणोंका अतिक्रमण करके
जन्म? मृत्यु और वृद्धावस्थारूप
दुःखोंसे रहित हुआ
अमरताका अनुभव करता है।

अर्जुन उवाच
कैर्लिंगैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो।
किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

अर्जुन बोले —
हे प्रभो इन तीनों गुणोंसे अतीत हुआ
मनुष्य किन लक्षणोंसे युक्त होता है
उसके आचरण कैसे होते हैं
और इन तीनों गुणोंका
अतिक्रमण कैसे किया जा सकता है

श्री भगवानुवाच
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

श्रीभगवान् बोले —
हे पाण्डव प्रकाश? प्रवृत्ति तथा मोह
— ये सभी अच्छी तरहसे प्रवृत्त हो जायँ
तो भी गुणातीत मनुष्य इनसे द्वेष नहीं करता?
और ये सभी निवृत्त हो जायँ
तो इनकी इच्छा नहीं करता।

उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते।
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

जो उदासीनकी तरह स्थित है
और जो गुणोंके द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता
तथा गुण ही (गुणोंमें) बरत रहे हैं —
इस भावसे जो अपने स्वरूपमें ही स्थित रहता है
और स्वयं कोई भी चेष्टा नहीं करता।

समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

जो धीर मनुष्य सुखदुःखमें सम तथा अपने स्वरूपमें स्थित रहता है जो मिट्टीके ढेले? पत्थर और सोनेमें सम रहता है जो प्रियअप्रियमें तथा अपनी निन्दास्तुतिमें सम रहता है जो मानअपमानमें तथा मित्रशत्रुके पक्षमें सम रहता है जो सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भका त्यागी है? वह मनुष्य गुणातीत कहा जाता है।

मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

जो धीर मनुष्य सुखदुःखमें सम तथा अपने स्वरूपमें स्थित रहता है जो मिट्टीके ढेले? पत्थर और सोनेमें सम रहता है जो प्रियअप्रियमें तथा अपनी निन्दास्तुतिमें सम रहता है जो मानअपमानमें तथा मित्रशत्रुके पक्षमें सम रहता है जो सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भका त्यागी है? वह मनुष्य गुणातीत कहा जाता है।

मां च योऽव्यभिचारेण भक्ितयोगेन सेवते।
स गुणान्समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

जो मनुष्य
अव्यभिचारी भक्तियोगके द्वारा
मेरा सेवन करता है?
वह इन गुणोंका अतिक्रमण करके
ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है।

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्ययस्य च।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

क्योंकि ब्रह्म?
अविनाशी अमृत?
शाश्वत धर्म और
ऐकान्तिक सुखका
आश्रय मैं ही हूँ।

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