श्रीमदभगवदगीता चतुर्थ अध्याय सभी श्लोक || Shrimad Bhagwad Geeta Chapter-4 All Shlok

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Lyrics Name:श्रीमदभगवदगीता चतुर्थ अध्याय सभी श्लोक
Album Name:Bhgwad Geeta Mahakavya
Published Year:2017



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श्री भगवानुवाच
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ।।4.1।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.1।। श्रीभगवान् बोले मैंने इस अविनाशी योग
को सूर्य से कहा था । फिर सूर्य ने (अपने पुत्र)
वैवस्वत मनु से कहा और मनु ने (अपने पुत्र)
राजा इक्ष्वाकुसे कहा ।

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ।।4.2।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.2।। हे परंतप इस तरह परम्परा से प्राप्त
इस योग को राजर्षियों ने जाना । परन्तु बहुत
समय बीत जाने के कारण वह योग इस मनुष्य
लोक में लुप्तप्राय हो गया ।

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ।।4.3।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.3।। तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है इसलिये
वही यह पुरातन योग आज मैंने तुझसे कहा है
क्योंकि यह बड़ा उत्तम रहस्य है ।

अर्जुन उवाच
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ।।4.4।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.4।। अर्जुन बोले आपका जन्म तो अभी का है
और सूर्य का जन्म बहुत पुराना है अतः आपने ही
सृष्टि के आदि में सूर्य से यह योग कहा था यह
बात मैं कैसे समझूँ ।

श्री भगवानुवाच
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ।।4.5।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.5।। श्रीभगवान् बोले हे परन्तप अर्जुन मेरे और
तेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं । उन सबको मैं जानता
हूँ पर तू नहीं जानता ।

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया ।।4.6।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.6।। मैं अजन्मा और अविनाशी स्वरूप होते
हुए भी तथा सम्पूर्ण प्राणियों का ईश्वर होते हुए
भी अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योग
माया से प्रकट होता हूँ ।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम् ।।4.7।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.7।। हे भरत वंशी अर्जुन जब जब धर्म की हानि
और अधर्म की वृद्धि होती है तब तब ही मैं अपने आपको
साकार रूप से प्रकट करता हूँ ।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ।।4.8।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.8।। साधुओं(भक्तों) की रक्षा करने के लिये पाप
कर्म करने वालों का विनाश करने के लिये और धर्म
की भली भाँति स्थापना करने के लिये मैं युग युग
में प्रकट हुआ करता हूँ ।

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ।।4.9।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.9।। हे अर्जुन मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं ।
इस प्रकार (मेरे जन्म और कर्म को) जो मनुष्य
तत्त्व से जान लेता अर्थात् दृढ़तापूर्वक मान लेता
है वह शरीर का त्याग करके पुनर्जन्म को प्राप्त
नहीं होता प्रत्युत मुझे प्राप्त होता है ।

वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ।।4.10।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.10।। राग भय और क्रोध से सर्वथा रहित मेरे
में ही तल्लीन मेरे ही आश्रित तथा ज्ञान रूप तप
से पवित्र हुए बहुत से भक्त मेरे भाव(स्वरूप) को
प्राप्त हो चुके हैं ।

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ।।4.11।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.11।। हे पृथा नन्दन जो भक्त जिस प्रकार मेरी
शरण लेते हैं मैं उन्हें उसी प्रकार आश्रय देता हूँ क्योंकि
सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे मार्ग का अनुकरण करते हैं ।

काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ।।4.12।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.12।। कर्मों की सिद्धि (फल) चाहने वाले मनुष्य
देवताओं की उपासना किया करते हैं क्योंकि इस मनुष्य
लोक में कर्मों से उत्पन्न होने वाली सिद्धि जल्दी मिल
जाती है ।

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ।।4.13।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.13 4.14।। मेरे द्वारा गुणों और कर्मों के विभाग पूर्वक
चारों वर्णों की रचना की गयी है । उस(सृष्टिरचना आदि) का
कर्ता होने पर भी मुझ अव्यय परमेश्वर को तू अकर्ता जान ।
कारण कि कर्मों के फल में मेरी स्पृहा नहीं है इसलिये मुझे
कर्म लिप्त नहीं करते । इस प्रकार जो मुझे तत्त्व से जान
लेता है वह भी कर्मों से नहीं बँधता ।

न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ।।4.14।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.13 4.14।। मेरे द्वारा गुणों और कर्मों के विभाग
पूर्वक चारों वर्णों की रचना की गयी है । उस(सृष्टि रचना
आदि) का कर्ता होने पर भी मुझ अव्यय परमेश्वर को तू
अकर्ता जान । कारण कि कर्मों के फल में मेरी स्पृहा नहीं
है इसलिये मुझे कर्म लिप्त नहीं करते । इस प्रकार जो मुझे
तत्त्व से जान लेता है वह भी कर्मों से नहीं बँधता ।

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ।।4.15।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.15।। पूर्वकाल के मुमुक्षुओं ने भी इस प्रकार जान
कर कर्म किये हैं इसलिये तू भी पूर्वजों के द्वारा सदा
से किये जाने वाले कर्मों को ही (उन्हीं की तरह) कर ।

किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ।।4.16।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.16।। कर्म क्या है और अकर्म क्या है
इस प्रकार इस विषय में विद्वान् भी मोहित
हो जाते हैं । अतः वह कर्म तत्त्व मैं तुम्हें
भली भाँति कहूँगा जिसको जानकर तू अशुभ
(संसार बन्धन)से मुक्त हो जायगा ।

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ।।4.17।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.17।। कर्म का तत्त्व भी जानना चाहिये और
अकर्म का तत्त्व भी जानना चाहिये तथा विकर्म
का तत्त्व भी जानना चाहिये क्योंकि कर्म की
गति गहन है ।

कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।
स बुद्धिमान् मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ।।4.18।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.18।। जो मनुष्य कर्म में अकर्म देखता है और
जो अकर्म में कर्म देखता है वह मनुष्यों में बुद्धिमान्
है योगी है और सम्पूर्ण कर्मों को करने वाला है ।

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः ।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ।।4.19।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.19।। जिसके सम्पूर्ण कर्मों के आरम्भ संकल्प और
कामना से रहित हैं तथा जिसके सम्पूर्ण कर्म ज्ञान रूपी
अग्नि से जल गये हैं उसको ज्ञानि जन भी पण्डित
(बुद्धिमान्) कहते हैं ।

त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः ।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः ।।4.20।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.20।। जो कर्म और फल की आसक्ति का त्याग
करके आश्रय से रहित और सदा तृप्त है वह कर्मों में
अच्छी तरह से लगा हुआ भी वास्तव में कुछ भी नहीं करता ।

निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ।।4.21।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.21।। जिसका शरीर और अन्तःकरण अच्छी तरह
से वश में किया हुआ है जिसने सब प्रकार के संग्रह का
परित्याग कर दिया है ऐसा आशा रहित कर्म योगी केवल
शरीर सम्बन्धी कर्म करता हुआ भी पाप को प्राप्त नहीं होता ।

यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते।।4.22।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.22।। जो (कर्मयोगी) फल की इच्छा के बिना अपने
आप जो कुछ मिल जाय उसमें सन्तुष्ट रहता है और जो
ईर्ष्या से रहित द्वन्द्वों से अतीत तथा सिद्धि और असिद्धि
में सम है वह कर्म करते हुए भी उससे नहीं बँधता ।

गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ।।4.23।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.23।। जिसकी आसक्ति सर्वथा मिट गयी है
जो मुक्त हो गया है जिसकी बुद्धि स्वरूप के ज्ञान
में स्थित है ऐसे केवल यज्ञ के लिये कर्म करने
वाले मनुष्य के सम्पूर्ण कर्म विलीन हो जाते हैं ।

ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ।।4.24।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.24।। जिस यज्ञ में अर्पण भी ब्रह्म है हवि भी
ब्रह्म है और ब्रह्म रूप कर्ता के द्वारा ब्रह्म रूप अग्नि
में आहुति देना रूप क्रिया भी ब्रह्म है (ऐसे यज्ञ को
करने वाले) जिस मनुष्य की ब्रह्म में ही कर्म समाधि
हो गयी है उसके द्वारा प्राप्त करने योग्य फल भी ब्रह्म ही है ।

दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते ।
ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति।।4.25।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.25।। अन्य योगी लोग भगवदर्पण रूप यज्ञ
का ही अनुष्ठान करते हैं और दूसरे योगी लोग ब्रह्म
रूप अग्नि में विचार रूप यज्ञ के द्वारा ही जीवात्मा
रूप यज्ञ का हवन करते हैं ।

श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति ।
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ।।4.26।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.26।। अन्य योगी लोग श्रोत्रादि समस्त इन्द्रियों
का संयम रूप अग्नियों में हवन किया करते हैं और
दूसरे योगी लोग शब्दादि विषयों का इन्द्रिय रूप
अग्नियों में हवन किया करते हैं ।

सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ।
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ।।4.27।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.27।। अन्य योगी लोग सम्पूर्ण इन्द्रियों की क्रियाओं
को और प्राणों की क्रियाओं को ज्ञान से प्रकाशित आत्मसंयम
योग रूप अग्नि में हवन किया करते हैं ।

द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे ।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ।।4.28।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.28।। दूसरे कितने ही तीक्ष्ण व्रत करने वाले
प्रयत्नशील साधक द्रव्य सम्बन्धी यज्ञ करने वाले
हैं और कितने ही तपो यज्ञ करने वाले हैं और
दूसरे कितने ही योग यज्ञ करने वाले हैं तथा
कितने ही स्वाध्याय रूप ज्ञान यज्ञ करने वाले हैं ।

अपाने जुह्वति प्राण प्राणेऽपानं तथाऽपरे ।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ।।4.29।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.29 4.30।। दूसरे कितने ही प्राणायाम के परायण
हुए योगी लोग अपान में प्राण का पूरक करके प्राण
और अपान की गति रोक कर फिर प्राण में अपान
का हवन करते हैं तथा अन्य कितने ही नियमित
आहार करने वाले प्राणों का प्राणों में हवन किया
करते हैं । ये सभी साधक यज्ञों द्वारा पापों का
नाश करने वाले और यज्ञों को जानने वाले हैं ।

अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति ।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ।।4.30।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.29 4.30।। दूसरे कितने ही प्राणायाम के परायण
हुए योगी लोग अपान में प्राण का पूरक करके प्राण और
अपान की गति रोक कर फिर प्राण में अपान का हवन
करते हैं तथा अन्य कितने ही नियमित आहार करने
वाले प्राणों का प्राणों में हवन किया करते हैं । ये सभी
साधक यज्ञों द्वारा पापों का नाश करने वाले और यज्ञों
को जानने वाले हैं ।

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतो़ऽन्यः कुरुसत्तम ।।4.31।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.31।। हे कुरुवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन यज्ञ से बचे हुए
अमृत का अनुभव करने वाले सनातन परब्रह्म परमात्मा
को प्राप्त होते हैं । यज्ञ न करने वाले मनुष्य के लिये यह
मनुष्य लोक भी सुख दायक नहीं है फिर परलोक कैसे
सुखदायक होगा ।

एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे ।
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ।।4.32।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.32।। इस प्रकार और भी बहुत तरह के यज्ञ
वेद की वाणी में विस्तार से कहे गये हैं । उन सब
यज्ञों को तू कर्म जन्य जान । इस प्रकार जानकर
यज्ञ करने से तू (कर्मबन्धन से) मुक्त हो जायगा ।

रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप ।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.33।। हे परन्तप अर्जुन द्रव्यमय यज्ञ से ज्ञान
यज्ञ श्रेष्ठ है । सम्पूर्ण कर्म और पदार्थ ज्ञान(तत्त्वज्ञान)
में समाप्त हो जाते हैं ।

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ।।4.34।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.34।। उस(तत्त्वज्ञान)को (तत्त्वदर्शी ज्ञानी महापुरुषोंके पास जाकर)
समझ । उनको साष्टाङ्ग दण्डवत् प्रणाम करने से उनकी सेवा करने
से और सरलतापूर्वक प्रश्न करने से वे तत्त्वदर्शी ज्ञानी महापुरुष तुझे
उस तत्त्वज्ञानका उपदेश देंगे ।

यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ।।4.35।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.35।। जिस(तत्त्वज्ञान) का अनुभव करने के बाद
तू फिर इस प्रकार मोह को नहीं प्राप्त होगा और हे
अर्जुन जिस(तत्त्वज्ञान)से तू सम्पूर्ण प्राणियों को
निःशेष भाव से पहले अपने में और उसके बाद
मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्मा में देखेगा ।

अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ।।4.36।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.36।। अगर तू सब पापियों से भी
अधिक पापी है तो भी तू ज्ञान रूपी
नौका के द्वारा निःसन्देह सम्पूर्ण पाप
समुद्र से अच्छी तरह तर जायगा ।

यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ।।4.37।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.37।। हे अर्जुन जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनों
को सर्वथा भस्म कर देती है ऐसे ही ज्ञान रूपी
अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को सर्वथा भस्म कर देती है ।

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ।।4.38।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.38।। इस मनुष्य लोक में ज्ञान के समान
पवित्र करने वाला दूसरा कोई साधन नहीं है ।
जिसका योग भली भाँति सिद्ध हो गया है वह
(कर्मयोगी) उस तत्त्व ज्ञान को अवश्य ही स्वयं
अपने आप में पा लेता है ।

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ।।4.39।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.39।। जो जितेन्द्रिय तथा साधन परायण
है ऐसा श्रद्धावान् मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता
है और ज्ञान को प्राप्त होकर वह तत्काल
परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है ।

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ।।4.40।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.40।। विवेक हीन और श्रद्धा रहित संशयात्मा
मनुष्य का पतन हो जाता है । ऐसे संशयात्मा
मनुष्य के लिये न यह लोक है न परलोक है
और न सुख ही है ।

योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम् ।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ।।4.41।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.41।। हे धनञ्जय योग(समता) के द्वारा जिसका
सम्पूर्ण कर्मों से सम्बन्ध विच्छेद हो गया है और ज्ञान
के द्वारा जिसके सम्पूर्ण संशयों का नाश हो गया है ऐसे
स्वरूप परायण मनुष्य को कर्म नहीं बाँधते ।

तस्मादज्ञानसंभूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनाऽऽत्मनः ।
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ।।4.42।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।4.42।। इसलिये हे भरत वंशी अर्जुन हृदय
में स्थित इस अज्ञान से उत्पन्न अपने संशय
का ज्ञान रूप तलवार से छेदन करके योग(समता)
में स्थित हो जा (और युद्धके लिये) खड़ा हो जा ।

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