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श्रीमदभगवदगीता पंचम अध्याय सभी श्लोक || Shrimad Bhagwad Geeta Chapter-5 All Shlok

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Lyrics Name: श्रीमदभगवदगीता पंचम अध्याय सभी श्लोक
Album Name:Shrimad Bhgwad Geeta Mahakavya
Published Year:2017



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अर्जुन उवाच
संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्िचतम् ।।5.1।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।5.1।। अर्जुन बोले हे कृष्ण आप कर्मों का
स्वरूप से त्याग करने की और फिर कर्म योग
की प्रशंसा करते हैं । अतः इन दोनों साधनों
में जो निश्चित रूप से कल्याण कारक हो
उसको मेरे लिये कहिये ।

श्री भगवानुवाच
संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।
तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ।।5.2।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।5.2।। श्रीभगवान् बोले संन्यास (सांख्य योग)
और कर्म योग दोनों ही कल्याण करने वाले हैं ।
परन्तु उन दोनों में भी कर्म संन्यास(सांख्ययोग)
से कर्मयोग श्रेष्ठ है ।

ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति ।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ।।5.3।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।5.3।। हे महा बाहो जो मनुष्य न किसी से द्वेष
करता है और न किसी की आकाङ्क्षा करता है वह
(कर्मयोगी) सदा संन्यासी समझने योग्य है क्योंकि
द्वन्द्वों से रहित मनुष्य सुख पूर्वक संसार बन्धन से
मुक्त हो जाता है ।

सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ।।5.4।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।5.4।। बे समझ लोग सांख्य योग और कर्म
योग को अलगअलग फलवाले कहते हैं न कि
पण्डित जन क्योंकि इन दोनों में से एक
साधन में भी अच्छी तरह से स्थित मनुष्य
दोनों के फलरूप परमात्मा को प्राप्त कर लेता है ।

यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते ।
एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ।।5.5।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।5.5।। सांख्य योगियों के द्वारा जो
तत्त्व प्राप्त किया जाता है कर्म योगियों
के द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है ।
अतः जो मनुष्य सांख्य योग और कर्म
योग को (फलरूपमें) एक देखता है वही
ठीक देखता है ।

संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ।।5.6।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।5.6।। (टिप्पणी प0 286) परन्तु हे महा बाहो
कर्म योग के बिना संन्यास सिद्ध होना कठिन है ।
मनन शील कर्म योगी शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त हो
जाता है ।

योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ।।5.7।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।5.7।। जिसकी इन्द्रियाँ अपने वश में हैं
जिसका अन्तःकरण निर्मल है जिसका शरीर
अपने वश में है और सम्पूर्ण प्राणियों की आत्मा
ही जिसकी आत्मा है ऐसा कर्म योगी कर्म करते
हुए भी लिप्त नहीं होता ।

नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ।
पश्यन् श्रृणवन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपन् श्वसन् ।।5.8।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।5.8 5.9।। तत्त्व को जानने वाला सांख्य योगी
देखता सुनता छूता सूँघता खाता चलता ग्रहण
करता बोलता त्याग करता सोता श्वास लेता
तथा आँखें खोलता और मूँदता हुआ भी सम्पूर्ण
इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों में बरत रही हैं ऐसा
समझकर मैं (स्वयं) कुछ भी नहीं करता हूँ ऐसा
माने ।

प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ।।5.9।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।5.8 5.9।। तत्त्व को जानने वाला सांख्य योगी
देखता सुनता छूता सूँघता खाता चलता ग्रहण
करता बोलता त्याग करता सोता श्वास लेता
तथा आँखें खोलता और मूँदता हुआ भी सम्पूर्ण
इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों में बरत रही हैं ऐसा
समझकर मैं (स्वयं) कुछ भी नहीं करता हूँ ऐसा
माने ।

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ।।5.10।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।5.10।। जो (भक्तियोगी) सम्पूर्ण कर्मों को
भगवान् में अर्पण करके और आसक्ति का त्याग
करके कर्म करता है वह जल से कमल के पत्ते
की तरह पाप से लिप्त नहीं होता ।

कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि ।
योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वाऽऽत्मशुद्धये ।।5.11।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।5.11।। कर्म योगी आसक्ति का त्याग
करके केवल (ममता रहित) इन्द्रियाँ शरीर
मन बुद्धि के द्वारा अन्तःकरण की शुद्धि के
लिये ही कर्म करते हैं ।

युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् ।
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ।।5.12।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।5.12।। कर्म योगी कर्म फल का त्याग
करके नैष्ठि की शान्ति को प्राप्त होता है ।
परन्तु सकाम मनुष्य कामना के कारण
फल में आसक्त होकर बँध जाता है ।

सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी ।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ।।5.13।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।5.13।। जिसकी इन्द्रियाँ वश में हैं ऐसा
देह धारी पुरुष नौ द्वारों वाले शरीर रूपी पुर
में सम्पूर्ण कर्मों का विवेक पूर्वक मन से
त्याग करके निःसन्देह न करता हुआ और
न करवाता हुआ सुख पूर्वक (अपने स्वरूपमें)
स्थित रहता है ।

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ।।5.14।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।5.14।। परमेश्वर मनुष्यों के न कर्तापन की
न कर्मों की और न कर्म फल के साथ संयोग
की रचना करते हैं किन्तु स्वभाव ही बरत रहा है ।

नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ।।5.15।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।5.15।। सर्वव्यापी परमात्मा न किसी के
पाप कर्म को और न शुभ कर्म को ही ग्रहण
करता है किन्तु अज्ञान से ज्ञान ढका हुआ है
उसी से सब जीव मोहित हो रहे हैं ।

ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ।।5.16।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।5.16।। परन्तु जिन्होंने अपने जिस ज्ञान(विवेक)
के द्वारा उस अज्ञान का नाश कर दिया है उनका वह
ज्ञान सूर्य की तरह परम तत्त्व परमात्मा को प्रकाशित
कर देता है ।

तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ।।5.17।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।5.17।। जिनकी बुद्धि तदाकार हो रही है
जिनका मन तदाकार हो रहा है जिनकी स्थिति
परमात्म तत्व में है ऐसे परमात्म परायण साधक
ज्ञान के द्वारा पाप रहित होकर अपुनरा वृत्ति (परम
गति) को प्राप्त होते हैं ।

विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ।।5.18।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।5.18।। ज्ञानी महापुरुष विद्या विनय युक्त
ब्राह्मण में और चाण्डाल में तथा गाय हाथी
एवं कुत्ते में भी समरूप परमात्मा को देखने
वाले होते हैं ।

इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः ।।5.19।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।5.19।। जिनका अन्तःकरण समता में स्थित है
उन्होंने इस जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार
को जीत लिया है क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और सम
है इसलिये वे ब्रह्म में ही स्थित हैं ।

न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ।
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः ।।5.20।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।5.20।। जो प्रिय को प्राप्त होकर हर्षित न हो
और अप्रिय को प्राप्त होकर उद्विग्न न हो वह
स्थिर बुद्धि वाला मूढ़ता रहित तथा ब्रह्म को
जानने वाला मनुष्य ब्रह्म में स्थित है ।

बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् ।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ।।5.21।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।5.21।। बाह्य स्पर्श में आसक्ति रहित अन्तःकरण
वाला साधक आत्मा में जो सुख है उसको प्राप्त होता
है । फिर वह ब्रह्म में अभिन्न भाव से स्थित मनुष्य
अक्षय सुख का अनुभव करता है ।

ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ।।5.22।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।5.22।। क्योंकि हे कुन्ती नन्दन जो इन्द्रियों और
विषयों के संयोग से पैदा होने वाले भोग (सुख) हैं
वे आदि अन्त वाले और दुःख के ही कारण हैं ।
अतः विवेकशील मनुष्य उनमें रमण नहीं करता ।

शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ।।5.23।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।5.23।। इस मनुष्य शरीर में जो कोई (मनुष्य)
शरीर छूटने से पहले ही काम क्रोध से उत्पन्न होने
वाले वेग को सहन करने में समर्थ होता है वह नर
योगी है और वही सुखी है ।

योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः ।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ।।5.24।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।5.24।। जो मनुष्य केवल परमात्मा में सुख
वाला है और केवल परमात्मा में रमण करने
वाला है तथा जो केवल परमात्मा में ज्ञान वाला
है वह ब्रह्म में अपनी स्थिति का अनुभव करने
वाला सांख्य योगी निर्वाण ब्रह्म को प्राप्त होता है ।

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ।।5.25।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।5.25।। जिनका शरीर मन बुद्धि इन्द्रियों सहित वश में
है जो सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत हैं जिनके सम्पूर्ण
संशय मिट गये हैं जिनके सम्पूर्ण कल्मष (दोष) नष्ट हो
गये हैं वे विवेकी साधक निर्वाण ब्रह्म को प्राप्त होते हैं ।

कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् ।
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम ।।5.26।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।5.26।। काम क्रोध से सर्वथा रहित जीते हुए मन वाले
और स्वरूप का साक्षात्कार किये हुए सांख्य योगियों के लिये
दोनों ओर से शरीर के रहते हुए अथवा शरीर छूटने के बाद
निर्वाण ब्रह्म परिपूर्ण है ।

स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः ।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ।।5.27।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।5.27 5.28।। बाह्य पदार्थों को बाहर ही छोड़ कर और नेत्रों
की दृष्टि को भौंहों के बीच में स्थित करके तथा नासिका में
विचरने वाले प्राण और अपान वायु को सम करके जिसकी
इन्द्रियाँ मन और बुद्धि अपने वश में हैं जो मोक्ष परायण है
तथा जो इच्छा भय और क्रोध से सर्वथा रहित है वह मुनि
सदा मुक्त ही है ।

यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः ।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ।।5.28।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।5.27 5.28।। बाह्य पदार्थों को बाहर ही छोड़ कर और नेत्रों की
दृष्टि को भौंहों के बीच में स्थित करके तथा नासिका में विचरने
वाले प्राण और अपान वायु को सम करके जिसकी इन्द्रियाँ मन
और बुद्धि अपने वश में हैं जो मोक्ष परायण है तथा जो इच्छा
भय और क्रोध से सर्वथा रहित है वह मुनि सदा मुक्त ही है ।

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ।।5.29।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।5.29।। भक्त मुझे सब यज्ञों और तपों का भोक्ता
सम्पूर्ण लोकों का महान् ईश्वर तथा सम्पूर्ण प्राणियों
का सुहृद् (स्वार्थरहित दयालु और प्रेमी) जानकर
शान्ति को प्राप्त हो जाता है ।

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