श्रीमदभगवदगीता षष्टम अध्याय सभी श्लोक || Shrimad Bhagwad Geeta Chapter-6 All Shlok

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Lyrics Name:श्रीमदभगवदगीता षष्टम अध्याय सभी श्लोक
Album Name: Shrimad Bhgwad Geeta Mahakavya
Published Year:2017





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मूल श्लोकः
श्री भगवानुवाच
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः।।6.1।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

श्रीभगवान् ने कहा जो पुरुष कर्मफल पर आश्रित न होकर कर्तव्य कर्म करता है वह संन्यासी और योगी है न कि वह जिसने केवल अग्नि का और क्रियायों का त्याग किया है।।

यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव।
न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन।।6.2।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

हे पाण्डव जिसको (शास्त्रवित्) संन्यास कहते हैं उसी को तुम योग समझो क्योंकि संकल्पों को न त्यागने वाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता।।

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते।।6.3।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।6.3।।
योग में आरूढ़ होने की इच्छा वाले मुनि के लिए कर्म करना ही हेतु (साधन) कहा है और योगारूढ़ हो जाने पर उसी पुरुष के लिए शम को (शांति संकल्पसंन्यास) साधन कहा गया है।।

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते।
सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते।।6.4।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

जब (साधक) न इन्द्रियों के विषयों में
और न कर्मों में आसक्त होता है
तब सर्व संकल्पों के संन्यासी
को योगारूढ़ कहा जाता है।।

उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।6.5।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

जब मनुष्य इस प्रकार योगारूढ़ हो जाता है तब वह अनर्थोंके समूह इस संसारसमुद्रसे स्वयं अपना उद्धार कर लेता है इसलिये संसारसागरमें डूबे पड़े हुए अपनेआपको उस संसारसमुद्रसे आत्मबलके द्वारा ऊँचा उठा लेना चाहिये अर्थात् योगारूढ़ अवस्थाको प्राप्त कर लेना चाहिये। अपना अधःपतन नहीं करना चाहिये अर्थात् अपने आत्माको नीचे नहीं गिरने देना चाहिये। क्योंकि यह आप ही अपना बन्धु है। दूसरा कोई ( ऐसा ) बन्धु नहीं है जो संसारसे मुक्त करनेवाला हो। प्रेमादि भाव बन्धनके स्थान होनेके कारण सांसारिक बन्धु भी ( वास्तवमें ) मोक्षमार्गका तो विरोधी ही होता है। इसलिये निश्चयपूर्वक यह कहना ठीक ही है कि आप ही अपना बन्धु है। तथा आप ही अपना शत्रु है। जो कोई दूसरा अनिष्ट करनेवाला बाह्य शत्रु है वह भी अपना ही बनाया हुआ होता है इसलिये आप ही अपना शत्रु है इस प्रकार केवल अपनेको ही शत्रु बतलाना भी ठीक ही है।

बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है यह बात कही गयी उसमें किन लक्षणोंवाला पुरुष तो ( आप ही ) अपना मित्र होता है और कौन ( आप ही ) अपना शत्रु होता है सो कहा जाता है उस जीवात्माका तो वही आप मित्र है कि जिसने स्वयमेव कार्यकरणके समुदाय शरीररूप आत्माको अपने वशमें कर लिया हो अर्थात् जो जितेन्द्रिय हो। जिसने ( कार्यकरणके संघात ) शरीररूप आत्माको अपने वशमें नहीं किया उसका वह आपही शत्रुकी भाँति शत्रुभावमें बर्तता है। अर्थात् जैसे दूसरा शत्रु अपना अनिष्ट करनेवाला होता है वैसे ही वह आप ही अपना अनिष्ट करनेमें लगा रहता है।

जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः

॥ श्लोक का अर्थ ॥

जिसने मन इन्द्रिय आदिके संघातरूप इस शरीरको अपने वशमें कर लिया है और जो प्रशान्त है जिसका अन्तःकरण सदा प्रसन्न रहता है उस संन्यासीको भली प्रकारसे सर्वत्र परमात्मा प्राप्त है अर्थात् साक्षात् आत्मभावसे विद्यमान है। तथा वह सर्दीगर्मी और सुखदुःखमें एवं मान और अपमानमें यानी पूजा और तिरस्कारमें भी ( सम हो जाता है )।

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रिय
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चन

॥ श्लोक का अर्थ ॥

शास्त्रोक्त पदार्थोंको समझनेका नाम ज्ञान है और शास्त्रसे समझे हुए भावोंको वैसे ही अपने अन्तःकरणमें प्रत्यक्ष अनुभव करनेका नाम विज्ञान है ऐसे ज्ञान और विज्ञान से जिसका अन्तःकरण तृप्त है अर्थात् जिसके अन्तःकरणमें ऐसा विश्वास उत्पन्न हो गया है कि बस अब कुछ भी जानना बाकी नहीं है ऐसा जो ज्ञानविज्ञानसे तृप्त हुए अन्तःकरणवाला है तथा जो कूटस्थ यानी अविचल और जितेन्द्रिय हो जाता है वह युक्त यानी समाहित ( समाधिस्थ ) कहा जाता है। वह योगी मिट्टी पत्थर और सुवर्णको समान समझनेवाला होता है अर्थात् उसकी दृष्टिमें मिट्टी पत्थर और सोना सब समान हैं ( एक ब्रह्मरूप है )।

सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते

॥ श्लोक का अर्थ ॥

तथा सुहृत् शब्दसे लेकर आधा श्लोक एक पद है। सुहृत् प्रत्युपकार न चाहकर उपकार करनेवाला मित्र प्रेमी अरि शत्रु उदासीन पक्षपातरहित मध्यस्थ जो परस्पर विरोध करनेवाले दोनोंका हितैषी हो द्वेष्य अपना अप्रिय और बन्धु अपना कुटुम्बी इन सबमें तथा शास्त्रानुसार चलनेवाले श्रेष्ठ पुरुषोंमें और निषिद्ध कर्म करनेवाले पापियोंमें भी जो समबुद्धिवाला है इन सबमें कौन कैसा क्या कर रहा है ऐसे विचारमें जिसकी बुद्धि नहीं लगती है वह श्रेष्ठ है। अर्थात् ऐसा योगी सब योगारूढ़ पुरुषोंमें उत्तम है। यहाँ विशिष्यते के स्थानमें विमुच्यते ( मुक्त हो जाता है ) ऐसा पाठान्तर भी है।

योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थित
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रह
॥ श्लोक का अर्थ ॥

अतः ऐसे उत्तम फलकी प्राप्तिके लिये ध्यान करनेवाला योगी अकेला किसीको साथ न लेकर पहाड़की गुफा आदि एकान्त स्थानमें स्थित हुआ निरन्तर अपने अन्तःकरणको ध्यानमें स्थिर किया करे। एकान्त स्थानमें स्थित हुआ और अकेला इन विशेषणोंसे यह भाव पाया जाता है कि संन्यास ग्रहण करके योगका साधन करे। जिसका चित्त अन्तःकरण और आत्मा शरीर ( दोनों ) जीते हुए हैं ऐसा यतचित्तात्मा निराशी तृष्णाहीन और संग्रहरहित होकर अर्थात् संन्यासी होनेपर भी सब संग्रहका त्याग करके योगका अभ्यास करे।

शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मन
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम

॥ श्लोक का अर्थ ॥

योगाभ्यास करनेवालेके लिये योगके साधनरूप आसन आहार और विहार आदिका नियम बतलाना उचित है एवं योगको प्राप्त हुए पुरुषका लक्षण और उसका फल आदि भी कहना चाहिये। इसलिये अब ( यह प्रकरण ) आरम्भ किया जाता है। उसमें पहले आसनका ही वर्णन करते हैं शुद्ध स्थानमें अर्थात् जो स्वभावसे अथवा झाड़नेबुहारने आदि संस्कारोंसे साफ किया हुआ पवित्र और एकान्त स्थान हो उसमें अपने आसनको जो न अति ऊँचा हो और न अति नीचा हो और जिसपर क्रमसे वस्त्र मृगचर्म और कुशा बिछाये गये हों अविचलभावसे स्थापन करके। यहाँ पाठक्रमसे उन वस्त्रादिका क्रम उलटा समझना चाहिये अर्थात् पहले कुशा उसपर मृगचर्म और फिर उसपर वस्त्र बिछावे।

तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये

॥ श्लोक का अर्थ ॥

( आसनको ) स्थिर स्थापन करके क्या करे ( सो कहते हैं ) उस आसनर बैठकर योगका साधन करे। कैसे करे मनको सब विषयोंसे हटाकर एकाग्र करके तथा यतचित्तेन्द्रियक्रिय यानी चित्त और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको जीतनेवाला होकर योगका साधन करे। जिसने मन और इन्द्रियोंकी क्रियाओंका संयम कर लिया हो उसको यतचित्तेन्द्रियक्रिय कहते हैं। वह किसलिये योगका साधन करे सो कहते हैं आत्मशुद्धिके लिये अर्थात् अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये करे।

समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः
संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्

॥ श्लोक का अर्थ ॥

बाह्य आसनका वर्णन किया अब शरीरको कैसे रखना चाहिये सो कहते हैं काया शिर और गरदनको सम और अचल भावसे धारण करके स्थिर होकर बैठे। समानभावसे धारण किये हुए कायादिका भी चलन होना सम्भव है इसलिये अचलम् यह विशेषण दिया गया है। तथा अपनी नासिकाके अग्रभागको देखता हुआ यानी मानो वह उधर ही अच्छी तरह देख रहा है। इस प्रकार दृष्टि करके। यहाँ संप्रेक्ष्य के साथ इव शब्द लुप्त समझना चाहिये क्योंकि यहाँ अपनी नासिकाके अग्रभागको देखनेका विधान करना अभिमत नहीं है। तो क्या है बस नेत्रोंकी दृष्टिको ( विषयोंकी ओरसे रोककर ) वहाँ स्थापन करना ही इष्ट है। वह ( इस तरह दृष्टिस्थापना करना ) भी अन्तःकरणके समाधानके लिये आवश्यक होनेके कारण भी अभीष्ट है। क्योंकि यदि अपनी नासिकाके अग्रभागको देखना ही विधेय माना जाय तो फिर मन वहीं स्थित होगा आत्मामें नहीं। परंतु ( आगे चलकर ) आत्मसंस्थं मनः कृत्वा इस पदसे आत्मामें ही मनको स्थित करना बतलायेंगे। इसलिये इव शब्दके लोपद्वारा नेत्रोंकी दृष्टिको नासिकाके अग्रभागपर लगाना ही संप्रेक्ष्य इस पदसे कहा गया। इस प्रकार ( नेत्रोंकी दृष्टिको नासिकाके अग्रभागपर लगाकर ) तथा अन्य दिशाओंको न देखता हुआ अर्थात् बीचबीचमें दिशाओंकी ओर दृष्टि न डालता हुआ।

ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

इसके उपरान्त श्वेत अश्वों से युक्त भव्य रथ में बैठे हुये माधव (श्रीकृष्ण) और पाण्डुपुत्र अर्जुन ने भी अपने दिव्य शंख बजाये।

पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनंजयः।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

भगवान् हृषीकेश ने पांचजन्य धनंजय (अर्जुन) ने देवदत्त तथा भयंकर कर्म करने वाले भीम ने पौण्डू नामक महाशंख बजाया।

अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने
अनन्त विजय नामक शंख
और नकुल व सहदेव ने
क्रमश सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाये।

काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

हे राजन् श्रेष्ठ धनुषवाले काशिराज और महारथी शिखण्डी तथा धृष्टद्युम्न एवं राजा विराट और अजेय सात्यकि? राजा द्रुपद और द्रौपदीके पाँचों पुत्र तथा लम्बीलम्बी भुजाओंवाले सुभद्रापुत्र अभिमन्यु इन सभीने सब ओरसे अलगअलग (अपनेअपने) शंख बजाये।

द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते।
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक्।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

हे राजन् श्रेष्ठ धनुषवाले काशिराज और महारथी शिखण्डी तथा धृष्टद्युम्न एवं राजा विराट और अजेय सात्यकि? राजा द्रुपद और द्रौपदीके पाँचों पुत्र तथा लम्बीलम्बी भुजाओंवाले सुभद्रापुत्र अभिमन्यु इन सभीने सब ओरसे अलगअलग (अपनेअपने) शंख बजाये।

स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

पाण्डवसेनाके शंखोंके उस भयंकर शब्दने आकाश और पृथ्वीको भी गुँजाते हुए अन्यायपूर्वक राज्य हड़पनेवाले दुर्योधन आदिके हृदय विदीर्ण कर दिये।

अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः।
प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

>हे महीपते धृतराष्ट्र अब शस्त्रोंके चलनेकी तैयारी हो ही रही थी कि उस समय अन्यायपूर्वक राज्यको धारण करनेवाले राजाओं और उनके साथियोंको व्यवस्थितरूपसे सामने खड़े हुए देखकर कपिध्वज पाण्डुपुत्र अर्जुनने अपना गाण्डीव धनुष उठा लिया और अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्णसे ये वचन बोले।

अर्जुन उवाच
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते।
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

>अर्जुन बोले हे अच्युत दोनों सेनाओंके मध्यमें मेरे रथको आप तबतक खड़ा कीजिये? जबतक मैं युद्धक्षेत्रमें खड़े हुए इन युद्धकी इच्छावालोंको देख न लूँ कि इस युद्धरूप उद्योगमें मुझे किनकिनके साथ युद्ध करना योग्य है।

यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

>अर्जुन बोले हे अच्युत दोनों सेनाओंके मध्यमें मेरे रथको आप तबतक खड़ा कीजिये? जबतक मैं युद्धक्षेत्रमें खड़े हुए इन युद्धकी इच्छावालोंको देख न लूँ कि इस युद्धरूप उद्योगमें मुझे किनकिनके साथ युद्ध करना योग्य है।

योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

दुष्टबुद्धि दुर्योधनका युद्धमें प्रिय करनेकी इच्छावाले जो ये राजालोग इस सेनामें आये हुए हैं? युद्ध करनेको उतावले हुए इन सबको मैं देख लूँ।

सञ्जय उवाच
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

सञ्जय बोले हे भरतवंशी राजन् निद्राविजयी अर्जुनके द्वारा इस तरह कहनेपर अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्णने दोनों सेनाओंके मध्यभागमें पितामह भीष्म और आचार्य द्रोणके सामने तथा सम्पूर्ण राजाओंके सामने श्रेष्ठ रथको खड़ा करके इस तरह कहा कि हे पार्थ इन इकट्ठे हुए कुरुवंशियोंको देख।

भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्।
उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति

॥ श्लोक का अर्थ ॥

>सञ्जय बोले हे भरतवंशी राजन् निद्राविजयी अर्जुनके द्वारा इस तरह कहनेपर अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्णने दोनों सेनाओंके मध्यभागमें पितामह भीष्म और आचार्य द्रोणके सामने तथा सम्पूर्ण राजाओंके सामने श्रेष्ठ रथको खड़ा करके इस तरह कहा कि हे पार्थ इन इकट्ठे हुए कुरुवंशियोंको देख।

यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्।।।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

यह चंचल और अस्थिर मन जिन कारणों से (विषयों में) विचरण करता है
उनसे संयमित करके उसे आत्मा के ही वश में लावे अर्थात् आत्मा में स्थिर करे।।

प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

जिसका मन प्रशान्त है जो पापरहित (अकल्मषम्) है और जिसका रजोगुण (विक्षेप) शांत हुआ है ऐसे ब्रह्मरूप हुए इस योगी को उत्तम सुख प्राप्त होता है।।

युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी विगतकल्मषः।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

योगविषयक विघ्नोंसे रहित हुआ विगतकल्मषनिष्पाप योगी उपर्युक्त क्रमसे सदा चित्तको समाहित करता हुआ अनायास ही ब्रह्मप्राप्तिरूप निरतिशय उत्कृष्ट सुखका अनुभव करता है अर्थात् जिसका परब्रह्मसे सम्बन्ध है और जो अन्तसे अतीतअनन्त है ऐसे परम सुखको प्राप्त हो जाता है।

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

अब योगका फल जो कि समस्त संसारका विच्छेद करा देनेवाला ब्रह्मके साथ एकताका देखना है वह दिखलाया जाता है समाहित अन्तःकरणसे युक्त और सब जगह समदृष्टिवाला योगी जिसका ब्रह्म और आत्माकी एकताको विषय करनेवाला ज्ञान ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त समस्त विभक्त प्राणियोंमें भेदभावसे रहित सम हो चुका है ऐसा पुरुष अपने आत्माको सब भूतोंमें स्थित (देखता है ) और आत्मामें सब भूतोंको देखता है। अर्थात् ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त समस्त प्राणियोंको आत्मामें एकताको प्राप्त हुए देखता है।

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

इस आत्माकी एकताके दर्शनका फल कहा जाता है जो सबके आत्मा मुझ वासुदेवको सब जगह अर्थात् सब भूतोंमें ( व्यापक ) देखता है और ब्रह्मा आदि समस्त प्राणियोंको मुझ सर्वात्मा ( परमेश्वर ) में देखता है इस प्रकार आत्माकी एकताको देखनेवाले उस ज्ञानीके लिये मैं ईश्वर कभी अदृश्य नहीं होता अर्थात् कभी अप्रत्यक्ष नहीं होता और वह ज्ञानी भी कभी मुझ वासुदेवसे अदृश्य परोक्ष नहीं होता क्योंकि उसका और मेरा स्वरूप एक ही है। निःसंदेह अपना आत्मा अपना प्रिय ही होता है और जो सर्वात्मभावसे एकताको देखनेवाला है वह मैं ही हूँ।

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

( एकत्व भावमें स्थित हुआ जो पुरुष सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित मुझ वासुदेवको भजता है ) इस प्रकार पहले श्लोकके अर्थरूप यथार्थ ज्ञानका इस आधे श्लोकसे अनुवाद करके उसके फलस्वरूप मोक्षका विधान करते हैं। वह पूर्ण ज्ञानी योगी सब प्रकारसे बर्तता हुआ भी वैष्णव परमपदरूप मुझ परमेश्वरमें ही बर्तता है अर्थात् वह सदा मुक्त ही है उसके मोक्षको कोई भी रोक नहीं सकता।

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दुःखं सः योगी परमो मतः।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

तथा और भी कहते हैं आत्मा अर्थात् स्वयं आप और जिसके द्वारा उपमित किया जाय वह उपमा उस उपमाके भावको ( सादृश्यको ) औपम्य कहते हैं। हे अर्जुन उस आत्मौपम्यद्वारा अर्थात् अपनी सदृशतासे जो योगी सर्वत्र सब भूतोंमें तुल्य देखता है। वह तुल्य क्या देखता है सो कहते हैं जैसे मुझे सुख प्रिय है वैसे ही सभी प्राणियोंको सुख अनुकूल है और जैसे दुःख मुझे अप्रिय प्रतिकूल है वैसे ही वह सब प्राणियोंको अप्रिय प्रतिकूल है। इस प्रकार जो सब प्राणियोंमें अपने समान ही सुख और दुःखको तुल्यभावसे अनुकूल और प्रतिकूल देखता है किसीके भी प्रतिकूल आचरण नहीं करता यानी अहिंसक है। यहाँ वा शब्दका प्रयोग च के अर्थमें हुआ है। जो इस प्रकारका अहिंसक पुरुष पूर्ण ज्ञानमें स्थित है वह योगी अन्य सब योगियोंमें परम उत्कृष्ट माना जाता है।

अर्जुन उवाच
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात् स्थितिं स्थिराम्।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

इस उपर्युक्त पूर्णज्ञानरूप योगको कठिनतासे सम्पादन किया जानेयोग्य समझकर उसकीप्राप्तिके निश्चित उपायको सुननेकी इच्छावाला अर्जुन बोला हे मधुसूदन आपने जो यह समत्वभावरूप योग कहा है मनकी चञ्चलताके कारण मैं इस योगकी अचल स्थिति नहीं देखता हैँ यह बात प्रसिद्ध है।

चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

क्योंकि हे कृष्ण यह मन बड़ा ही चञ्चल है। विलेखनके अर्थमें जो कृष धातु है उसका रूप कृष्ण है। भक्तजनोंके पापादि दोषोंको निवृत्त करनेवाले होनेके कारण भगवान्का नाम कृष्ण है। यह मन केवल अत्यन्त चञ्चल है इतना ही नही किंतु प्रमथनशील भी है अर्थात् शरीरको क्षुब्ध और इन्द्रियोंको विक्षिप्त यानी परवश कर देता है। तथा बड़ा बलवान् है किसीसे भी वशमें किया जाना अशक्य है। साथ ही यह बड़ा दृढ़ भी है। अर्थात् तन्तुनाग ( गोह ) नामक जलचर जीवकी भाँति अच्छेद्य है। ऐसे लक्षणोंवाले इस मनका विरोध करना मैं वायुकी भाँति दुष्कर मानता हूँ। अभिप्राय यह कि जैसे वायुका रोकना दुष्कर है उससे भी अधिक दुष्कर मैं मनका रोकना मानता हूँ।

श्री भगवानुवाच
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

श्रीभगवान् बोले कि जैसे तू कहता है यह ठीक ऐसा ही है हे महाबाहो मन चञ्चल और कठिनतासे वशमें होनेवाला है इसमें ( कोई ) संदेह नहीं। किंतु अभ्याससे अर्थात् किसी चित्तभूमिमें एक समान वृत्तिकी बारंबार आवृत्ति करनेसे और दृष्ट तथा अदृष्ट प्रिय भोगोंमें बारंबार दोषदर्शनके अभ्यासद्वारा उत्पन्न हुए अनिच्छारूप वैराग्यसे चित्तके विक्षेपरूप प्रचार ( चञ्चलता ) को रोका जा सकता है। अर्थात् इस प्रकार उस मनका निग्रह निरोध किया जा सकता है।

असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

परंतु जिसका अन्तःकरण वशमें किया हुआ नहीं है उस मनको वशमें न करनेवाले पुरुषद्वारा अर्थात् जिसका अन्तःकरण अभ्यास और वैराग्यद्वारा संयत किया हुआ नहीं है ऐसे पुरुषद्वारा योग प्राप्त किया जाना कठिन है अर्थात् उसको योग कठिनतासे प्राप्त हो सकता है यह मेरा निश्चय है। परंतु जो स्वाधीन मनवाला है जिसका मन अभ्यासवैराग्यद्वारा वशमें किया हुआ है और जो फिर भी बारंबार यत्न करता ही जाता है ऐसे पुरुषद्वारा पूर्वोक्त उपायोंसे यह योग प्राप्त किया जा सकता है

अर्जुन उवाच
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

योगाभ्यासको स्वीकार करके जिसने इस लोक और परलोककी प्राप्तिके साधनरूप कर्मोंका तो त्याग कर दिया और योगसिद्धिका फल मोक्षप्राप्तिका साधन पूर्ण ज्ञान जिसको मिला नहीं ऐसे जिस योगीका चित्त अन्तकालमें योगमार्गसे विचलित हो गया हो उस योगीके नाशकी आशङ्का करके अर्जुन पूछने लगा हे कृष्ण जो साधक योगमार्गमें यत्न करनेवाला नहीं है परंतु श्रद्धासे अर्थात् आस्तिकबुद्धिसे युक्त है और अन्तकालमें जिसका मन योगसे चलायमान हो गया है वह चञ्चलचित्त भ्रष्ट स्मृतिवाला योगी योगकी सिद्धिको अर्थात् योगफलरूप पूर्ण ज्ञानको न पाकर किस गतिको प्राप्त होता है ।

कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

हे महाबाहो वह आश्रयरहित और ब्रह्मप्राप्तिके मार्गमें मोहित हुआ पुरुष कर्ममार्ग और ज्ञानमार्ग दोनों ओरसे भ्रष्ट होकर क्या छिन्नभिन्न हुए बादलकी भाँति नष्ट हो जाता है अथवा नष्ट नहीं होता।

एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

हे कृष्ण मेरे इस संशयको निःशेषतासे काटनेके लिये अर्थात् नष्ट करनेके लिये आप हीसमर्थ हैं क्योंकि आपको छोड़कर दूसरा कोई ऋषि या देवता इस संशयका नाश करनेवाला सम्भव नहीं है। अतः आपको ही इसका नाश करना चाहिये यह अभिप्राय है।

श्री भगवानुवाच
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।
नहि कल्याणकृत्कश्िचद्दुर्गतिं तात गच्छति

॥ श्लोक का अर्थ ॥

श्रीभगवान् बोले हे पार्थ उस योगभ्रष्ट पुरुषका इस लोकमें या परलोकमें कहीं भी नाश नहीं होता है। पहलेकी अपेक्षा हीनजन्मकी प्राप्तिका नाम नाश है सो ऐसी अवस्था योगभ्रष्टकी नहीं होती। क्योंकि हे तात शुभ कार्य करनेवाला कोई भी मनुष्य दुर्गतिको अर्थात् नीच गतिको नहीं पाता। पिता पुत्ररूपसे आत्माका विस्तार करता है अतः उसको तात कहते हैं तथा पिता ही पुत्ररूपसे उत्पन्न होता है अतः पुत्रको भी तात कहते हैं। शिष्य भी पुत्रके तुल्य है इसलिये उसको भी तात कहते हैं।

प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

तो फिर इस योगभ्रष्टका क्या होता है योगमार्गमें लगा हुआ योगभ्रष्ट संन्यासी पुण्यकर्म करनेवालोंके अर्थात् अश्वमेध आदि यज्ञ करनेवालोंके लोकोंमें जाकर वहाँ बहुत कालतक अर्थात् अनन्त वर्षोंतक वास करके उनके भोगका क्षय होनेपर शास्त्रोक्त कर्म करनेवाले शुद्ध और श्रीमान् पुरुषोंके घरमें जन्म लेता है। प्रकरणकी सामर्थ्यसे यहाँ योगभ्रष्टका अर्थ संन्यासी लिया गया है।

अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

अथवा श्रीमानोंके कुलसे अन्य जो बुद्धिमान् दरिद्र योगियोंका कुल है उसीमें जन्म ले लेता है। परंतु ऐसा जन्म अर्थात् जो उपर्युक्त दरिद्र आदि विशेषणोंसे युक्त योगियोंके कुलमें उत्पन्न होना है वह इस लोकमें पहले बतलाये हुए श्रीमानोंके कुलमें उत्पन्न होनेकी अपेक्षा अत्यन्त दुर्लभ है।

तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन

॥ श्लोक का अर्थ ॥

क्योंकि वहाँ योगियोंके कुलमें पहले शरीरमें होनेवाले उस बुद्धिके संयोगको पाता है अर्थात् योगीकुलमें जन्म लेते ही उसका पूर्वजन्ममें प्राप्त हुई बुद्धिसे सम्बन्ध हो जाता है और हे कुरुनन्दन वह उस पूर्वकृत संस्कारके बलसे पूर्ण सिद्धि प्राप्त करनेके लिये फिर और भी अधिक प्रयत्न करता है।

पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

पहले शरीरकी बुद्धिसे उसका संयोग कैसे होता है सो कहते हैं क्योंकि वह योगभ्रष्ट पुरुष परवश हुआ भी पूर्वाभ्यासके द्वारा अर्थात् जो पहले जन्ममें किया हुआ अभ्यास है उस अति बलवान् पूर्वाभ्यासके द्वारा योगकी ओर खींच लिया जाता है। यदि योगाभ्यासके संस्कारोंकी अपेक्षा अधिक बलवान् अधर्मादि कर्म न किये हों तो वह योगाभ्यासजनित संस्कारोंसे खिंच जाता है और यदि अधिक बलवान् अधर्म किया हुआ होता है तो उससे योगजन्य संस्कार भी दब ही जाते हैं। परंतु उस पापकर्मका क्षय होनेपर योगजन्य संस्कार स्वयं ही अपना कार्य आरम्भ कर देता है। बहुत बालतक दबे रहनेपर भी उसका नाश नहीं होता। जो योगका जिज्ञासु भी है अर्थात् जो योगके स्वरूपको जाननेकी इच्छा करके योगमार्गमें लगा हुआ योगभ्रष्ट संन्यासी है वह भी शब्दब्रह्मको अर्थात् वेदमें कहे हुए कर्मफलको अतिक्रम कर जाता है फिर जो योगको जानकर उसमें स्थित हुआ अभ्यास करता है उसका तो कहना ही क्या है। यहाँ प्रसंगकी शक्तिसे जिज्ञासुका अर्थ संन्यासी किया गया है।

प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्

॥ श्लोक का अर्थ ॥

योगित्व श्रेष्ठ किस कारणसे है जो प्रयत्नपूर्वक अधिक साधनमें लगा हुआ है वह विद्वान् योगी विशुद्धकिल्बिष अर्थात् अनेक जन्मोंमें थोड़ेथोड़े संस्कारोंको एकत्रितकर उन अनेक जन्मोंके सञ्चित संस्कारोंसे पापरहित होकर सिद्ध अवस्थाको प्राप्त हुआ सम्यक् ज्ञानको प्राप्त करके परमगति मोक्षको प्राप्त होता है।

तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

ऐसा होनेके कारण तपस्वियों और ज्ञानियोंसे भी योगी अधिक है। यहाँ ज्ञान शास्त्रविषयक पाण्डित्यका नाम है उससे युक्त जो ज्ञानवान् हैं उनकी अपेक्षा योगी अधिक श्रेष्ठ है। तथा अग्निहोत्रादि कर्म करनेवालोंसे भी योगी अधिक श्रेष्ठ है इसलिये हे अर्जुन तू योगी है।

योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

रुद्र आदित्य आदि देवोंके ध्यानमें लगे हुए समस्त योगियोंसे भी जो योगी श्रद्धायुक्त हुआ मुझ वासुदेवमें अच्छी प्रकार स्थित किये हुए अन्तःकरणसे मुझे ही भजता है उसे मैं युक्ततम अर्थात् अतिशय श्रेष्ठ योगी मानता हूँ।

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