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Shrimad Bhagwad Geeta Shlok Chapter-6 Shlok-32 ॥ श्रीमदभगवदगीता श्लोक षष्टम अध्याय –द्वात्रिंशत् श्लोक ॥

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Geeta Shlok/Lyrics Name:आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।aatmaupamyen sarvatr saman pashyati yorjun.
Album Name : Shrimad Bhgwad Geeta Mahakavya
Published Year : 2016
File Size:317Kb Time Duration:00:18



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आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दुःखं सः योगी परमो मतः।।

॥ श्लोक का अर्थ ॥

तथा और भी कहते हैं आत्मा अर्थात् स्वयं आप और जिसके द्वारा उपमित किया जाय वह उपमा उस उपमाके भावको ( सादृश्यको ) औपम्य कहते हैं। हे अर्जुन उस आत्मौपम्यद्वारा अर्थात् अपनी सदृशतासे जो योगी सर्वत्र सब भूतोंमें तुल्य देखता है। वह तुल्य क्या देखता है सो कहते हैं जैसे मुझे सुख प्रिय है वैसे ही सभी प्राणियोंको सुख अनुकूल है और जैसे दुःख मुझे अप्रिय प्रतिकूल है वैसे ही वह सब प्राणियोंको अप्रिय प्रतिकूल है। इस प्रकार जो सब प्राणियोंमें अपने समान ही सुख और दुःखको तुल्यभावसे अनुकूल और प्रतिकूल देखता है किसीके भी प्रतिकूल आचरण नहीं करता यानी अहिंसक है। यहाँ वा शब्दका प्रयोग च के अर्थमें हुआ है। जो इस प्रकारका अहिंसक पुरुष पूर्ण ज्ञानमें स्थित है वह योगी अन्य सब योगियोंमें परम उत्कृष्ट माना जाता है।

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