श्रीमद्भगवतगीता श्लोक द्वितीय अध्याय सभी श्लोक || Srimad Bhagawat Geeta Chapter 2 All Shlok


#BHAKTIGAANE #GEETASHLOK #BHAGWATSHLOK
Lyrics Name:श्रीमद्भगवतगीता श्लोक द्वितीय अध्याय सभी श्लोक
Album Name: Shrimad Bhgwat Geeta Mahakavya
Published Year:2017



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सञ्जय उवाच
तं तथा कृपयाऽविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ।।2.1।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।1.1।।सञ्जय बोले वैसी कायरता से आविष्ट उन
अर्जुन के प्रति जो कि विषाद कर रहे हैं और आँसुओं
के कारण जिनके नेत्रों की देखने की शक्ति अवरुद्ध हो
रही है भगवान् मधुसूदन ये (आगे कहे जानेवाले) वचन बोले ।

श्री भगवानुवाच
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ।।2.2।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.2।। श्रीभगवान् बोले (टिप्पणी प0 38.1) हे अर्जुन इस
विषम अवसर पर तुम्हें यह कायरता कहाँ से प्राप्त हुई जिसका
कि श्रेष्ठ पुरुष सेवन नहीं करते जो स्वर्ग को देने वाली नहीं है
और कीर्ति करने वाली भी नहीं है ।
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ।।2.3।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.3।।हे पृथा नन्दन अर्जुन इस नपुंसकता को मत
प्राप्त हो क्योंकि तुम्हारे में यह उचित नहीं है । हे
परंतप हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता का त्याग करके
युद्ध के लिये खड़े हो जाओ ।
अर्जुन उवाच
कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ।।2.4।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.4।। अर्जुन बोले हे मधुसूदन मैं रणभूमि में
भीष्म और द्रोण के साथ बाणों से युद्ध कैसे करूँ
क्योंकि हे अरिसूदन ये दोनों ही पूजा के योग्य हैं ।
गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ।।2.5।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.5।। महानुभाव गुरुजनों को न मारकर मैं
भिक्षाका अन्न खाना भी श्रेष्ठ समझता हूँ ।
गुरुजनों को मारकर यहाँ रक्त से सने हुए
तथा धन की कामना की मुख्यता वाले
भोगों को ही तो भोगूँगा ।
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।
यानेव हत्वा न जिजीविषाम स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ।।2.6।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.6।। हम यह भी नहीं जानते कि हम लोगों के लिये युद्ध
करना और न करना इन दोनों में से कौन सा अत्यन्त श्रेष्ठ है
और हमें इसका भी पता नहीं है कि हम उन्हें जीतेंगे अथवा वे
हमें जीतेंगे । जिनको मारकर हम जीना भी नहीं चाहते वे ही
धृतराष्ट्र के सम्बन्धी हमारे सामने खड़े हैं ।
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः ।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्िचतं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं
शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ।।2.7।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.7।। कायरता के दोष से उपहत स्वभाव वाला
और धर्म के विषय में मोहित अन्तःकरण वाला मैं
आपसे पूछता हूँ कि जो निश्चित श्रेय हो वह मेरे लिये
कहिये । मैं आपका शिष्य हूँ । आपके शरण हुए मेरे
को शिक्षा दीजिये ।
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या द्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् ।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धम् राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ।।2.8।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.8।। पृथ्वी पर धन धान्य समृद्ध और निष्कण्टक
राज्य तथा स्वर्ग में देवताओं का आधिपत्य मिल जाय
तो भी इन्द्रियों को सुखाने वाला मेरा जो शोक है वह दूर
हो जाय ऐसा मैं नहीं देखता हूँ ।
सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप ।
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ।।2.9।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.9।। सञ्जय बोले हे शत्रुतापन धृतराष्ट्र ऐसा
कह कर निद्रा को जीतने वाले अर्जुन अन्तर्यामी
भगवान् गोविन्द से मैं युद्ध नहीं करूँगा ऐसा स्पष्ट
कहकर चुप हो गये ।
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ।।2.10।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.10।। हे भरत वंशोद्भव धृतराष्ट्र दोनों सेनाओं
के मध्य भाग में विषाद करते हुए उस अर्जुन के
प्रति हँसते हुएसे भगवान् हृषीकेश ये (आगे कहे
जानेवाले) वचन बोले ।
श्री भगवानुवाच
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ।।2.11।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.11।। श्रीभगवान् बोले तुमने शोक न करने योग्य
का शोक किया है और पण्डिताई की बातें कह रहे हो
परन्तु जिनके प्राण चले गये हैं उनके लिये और जिनके
प्राण नहीं गये हैं उनके लिये पण्डित लोग शोक नहीं करते ।
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ।।2.12।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.12।। किसी काल में मैं नहीं था और तू नहीं था
तथा ये राजा लोग नहीं थे यह बात भी नहीं है और
इसके बाद मैं तू और राजा लोग ये सभी नहीं रहेंगे
यह बात भी नहीं है ।
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ।।2.13।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.13।। देह धारी के इस मनुष्य शरीर में जैसे
बालकपन जवानी और वृद्धावस्था होती है ऐसे ही
देहान्तर की प्राप्ति होती है । उस विषय में धीर
मनुष्य मोहित नहीं होता ।
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ।।2.14।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.14।। हे कुन्ती नन्दन इन्द्रियों के जो विषय
(जड पदार्थ) हैं वे तो शीत (अनुकूलता) और उष्ण
(प्रतिकूलता) के द्वारा सुख और दुःख देने वाले हैं ।
वे आने जाने वाले और अनित्य हैं । हे भरत वंशोद्भव
अर्जुन उनको तुम सहन करो ।
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ।।2.15।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.15।। हे पुरुषों में श्रेष्ठ अर्जुन सुख दुःख में सम
रहने वाले जिस धीर मनुष्य को ये मात्रा स्पर्श (पदार्थ)
व्यथा नहीं पहुँचाते वह अमर होने में समर्थ हो जाता है
अर्थात् वह अमर हो जाता है ।
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ।।2.16।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.16।। (टिप्पणी प0 55) असत् का तो भाव (सत्ता)
विद्यमान नहीं है और सत् का अभाव विद्यमान नहीं है
तत्त्वदर्शी महापुरुषों ने इन दोनों का ही अन्त अर्थात्
तत्त्व देखा है ।
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्िचत् कर्तुमर्हति ।।2.17।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.17।। अविनाशी तो उसको जान जिससे यह
सम्पूर्ण संसार व्याप्त है । इस अविनाशी का विनाश
कोई भी नहीं कर सकता ।
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ।।2.18।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.18।। अविनाशी अप्रमेय और नित्य रहने
वाले इस शरीर के ये देह अन्त वाले कहे गये हैं ।
इसलिये हे अर्जुन तुम युद्ध करो ।
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ।।2.19।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.19।। जो मनुष्य इस अविनाशी शरीरी को मारने वाला
मानता है और जो मनुष्य इसको मरा मानता है वे दोनों ही
इसको नहीं जानते क्योंकि यह न मारता है और न मारा जाता है ।
न जायते म्रियते वा कदाचि न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ।।2.20।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.20।। यह शरीर न कभी जन्मता है और न मरता है ।
यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला नहीं है । यह जन्म रहित
नित्य निरन्तर रहने वाला शाश्वत और पुराण (अनादि) है ।
शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता ।
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ।।2.21।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.21।। हे पृथा नन्दन जो मनुष्य इस शरीरी को
अविनाशी नित्य जन्म रहित और अव्यय जानता है
वह कैसे किसको मारे और कैसे किसको मरवाये |
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यन्यानि संयाति नवानि देही ।।2.22।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.22।। मनुष्य जैसे पुराने कपड़ों को छोड़कर दूसरे
नये कपड़े धारण कर लेता है ऐसे ही देही पुराने शरीरों
को छोड़कर दूसरे नये शरीरों में चला जाता है ।

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ।।2.23।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.23।। शस्त्र इस शरीरी को काट नहीं सकते
अग्नि इसको जला नहीं सकती जल इसको गीला
नहीं कर सकता और वायु इसको सुखा नहीं सकती ।

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ।।2.24।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.24।। यह शरीर काटा नहीं जा सकता
यह जलाया नहीं जा सकता यह गीला नहीं
किया जा सकता और यह सुखाया भी नहीं
जा सकता । कारण कि यह नित्य रहने
वाला सब में परिपूर्ण अचल स्थिर स्वभाव
वाला और अनादि है ।
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ।।2.25।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.25।। यह देही प्रत्यक्ष नहीं दिखता यह
चिन्तन का विषय नहीं है और इसमें कोई
विकार नहीं है । अतः इस देही को ऐसा
जान कर शोक नहीं करना चाहिये ।

अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ।।2.26।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.26।। हे महा बाहो अगर तुम इस देही
को नित्य पैदा होने वाला और नित्य मरने
वाला भी मानो तो भी तुम्हें इसका शोक नहीं
करना चाहिये ।
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ।।2.27।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.27।। क्योंकि पैदा हुए की जरूर मृत्यु होगी
और मरे हुए का जरूर जन्म होगा इस(जन्म
मरण के प्रवाह) का परिहार अर्थात् निवारण
नहीं हो सकता । अतः इस विषय में तुम्हें
शोक नहीं करना चाहिये ।

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ।।2.28।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.28।। हे भारत सभी प्राणी जन्म से पहले
अप्रकट थे और मरने के बाद अप्रकट हो जायँगे
केवल बीच में प्रकट दिखते हैं अतः इसमें शोक
करने की बात ही क्या है |

आश्चर्यवत्पश्यति कश्िचदेन माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्िचत् ।।2.29।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.29।। कोई इस शरीरी को आश्चर्यकी तरह देखता है ।
वैसे ही अन्य कोई इसका आश्चर्य की तरह वर्णन करता है
तथा अन्य कोई इसको आश्चर्य की तरह सुनता है और
इसको सुन करके भी कोई नहीं जानता ।

देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ।।2.30।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.30।। हे भरत वंशोद्भव अर्जुन सबके देह में यह
देही नित्य ही अवध्य है । इसलिये सम्पूर्ण प्राणियों
के लिये अर्थात् किसी भी प्राणी के लिये तुम्हें शोक
नहीं करना चाहिये ।
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि ।
धर्म्याद्धि युद्धाछ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ।।2.31।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.31।। अपने धर्म को देख कर भी तुम्हें विकम्पित
अर्थात् कर्तव्य कर्म से विचलित नहीं होना चाहिये
क्योंकि धर्ममय युद्ध से बढ़कर क्षत्रिय के लिये
दूसरा कोई कल्याण कारक कर्म नहीं है ।
यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् ।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ।।2.32।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.32।। अपने आप प्राप्त हुआ युद्ध खुला हुआ स्वर्ग
का दरवाजा है । हे पृथा नन्दन वे क्षत्रिय बड़े सुखी हैं
जिनको ऐसा युद्ध प्राप्त होता है ।
अथ चैत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि ।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ।।2.33।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.33।। अब अगर तू यह धर्म मय युद्ध नहीं
करेगा तो अपने धर्म और कीर्ति का त्याग करके
पाप को प्राप्त होगा ।

अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ।
संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ।।2.34।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.34।। सब प्राणी भी तेरी सदा रहने वाली अपकीर्ति
का कथन करेंगे । वह अपकीर्ति सम्मानित मनुष्य के
लिये मृत्यु से भी बढ़ कर दुःख दायी होती है ।
भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ।।2.35।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.35।। महारथी लोग तुझे भय के कारण
युद्ध से उपरत हुआ मानेंगे । जिनकी धारणा
में तू बहुमान्य हो चुका है उनकी दृष्टि में
तू लघुता को प्राप्त हो जायगा ।
अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः ।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ।।2.36।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.36।। तेरे शत्रु लोग तेरी सार्मथ्य की निन्दा
करते हुए न कहने योग्य बहुत से वचन कहेंगे ।
उससे बढ़कर और दुःख की बात क्या होगी ।

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ।।2.37।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.37।। अगर युद्ध में तू मारा जायगा तो तुझे
स्वर्ग की प्राप्ति होगी और अगर युद्ध में तू जीत
जायगा तो पृथ्वी का राज्य भोगेगा । अतः हे
कुन्ती नन्दन तू युद्ध के लिये निश्चय करके
खड़ा हो जा ।

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ।।2.38।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.38।। जय पराजय लाभ हानि और सुख
दुःख को समान करके फिर युद्ध में लग जा ।
इस प्रकार युद्ध करने से तू पाप को प्राप्त नहीं होगा ।

एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु ।
बुद्ध्यायुक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ।।2.39।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.39।। हे पार्थ यह सम बुद्धि पहले सांख्य योग
में कही गयी अब तू इसको कर्मयोग के विषय में
सुन जिस सम बुद्धि से युक्त हुआ तू कर्म बन्धन
का त्याग कर देगा ।
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ।।2.40।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.40।। मनुष्य लोक में इस सम बुद्धि रूप धर्म
के आरम्भ का नाश नहीं होता इसके अनुष्ठान का
उलटा फल भी नहीं होता और इसका थोड़ा सा भी
अनुष्ठान (जन्ममरणरूप) महान् भय से रक्षा कर लेता है ।

रेव्यवसायात्मिका बुद्धिकेह कुरुनन्दन ।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ।।2.41।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.41।। हे कुरु नन्दन इस सम बुद्धि की प्राप्ति
के विषय में व्यवसायात्मि का बुद्धि एक ही होती है ।
अव्यवसायी मनुष्यों की बुद्धियाँ अनन्त और बहुशाखाओं
वाली ही होती हैं ।

यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्िचतः ।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ।।2.42।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.42 2.43।। हे पृथा नन्दन जो कामनाओं में तन्मय
हो रहे हैं स्वर्ग को ही श्रेष्ठ मानने वाले हैं वेदों में कहे हुए
सकाम कर्मों में प्रीति रखने वाले हैं भोगों के सिवाय और
कुछ है ही नहीं ऐसा कहने वाले हैं वे अविवेकी मनुष्य इस
प्रकार की जिस पुष्पित (दिखाऊ शोभायुक्त) वाणी को कहा
करते हैं जो कि जन्म रूपी कर्म फल को देने वाली है तथा
भोग और ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये बहुत सी क्रियाओं का
वर्णन करने वाली है ।

कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ।।2.43।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.42 2.43।। हे पृथा नन्दन जो कामनाओं में
तन्मय हो रहे हैं स्वर्ग को ही श्रेष्ठ मानने वाले हैं
वेदों में कहे हुए सकाम कर्मों में प्रीति रखने वाले
हैं भोगों के सिवाय और कुछ है ही नहीं ऐसा कहने
वाले हैं वे अविवेकी मनुष्य इस प्रकार की जिस पुष्पित
(दिखाऊ शोभायुक्त) वाणी को कहा करते हैं जो कि जन्म
रूपी कर्म फल को देने वाली है तथा भोग और ऐश्वर्य की
प्राप्ति के लिये बहुत सी क्रियाओं का वर्णन करने वाली है ।

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ।।2.44।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.44।। उस पुष्पित वाणी से जिसका अन्तः
करण हर लिया गया है अर्थात् भोगों की तरफ
खिंच गया है और जो भोग तथा ऐश्वर्य में
अत्यन्त आसक्त हैं उन मनुष्यों की परमात्मा
में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती ।
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ।।2.45।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.45।। वेद तीनों गुणों के कार्य का ही
वर्णन करने वाले हैं हे अर्जुन तू तीनों गुणों
से रहित हो जा निर्द्वन्द्व हो जा निरन्तर नित्य
वस्तु में स्थित हो जा योगक्षेम की चाहना भी
मत रख और परमात्म परायण हो जा ।
यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके ।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ।।2.46।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.46।। सब तरफ से परिपूर्ण महान् जलाशय
के प्राप्त होने पर छोटे जलाशय में मनुष्य का
जितना प्रयोजन रहता है अर्थात् कुछ भी
प्रयोजन नहीं रहता वेदों और शास्त्रों को तत्त्व से
जानने वाले ब्रह्मज्ञानी का सम्पूर्ण वेदों में उतना
ही प्रयोजन रहता है अर्थात् कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता ।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ।।2.47।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.47।। कर्तव्य कर्म करने में ही तेरा अधिकार
है फलों में कभी नहीं । अतः तू कर्म फल का हेतु
भी मत बन और तेरी अकर्मण्यता में भी आसक्ति न हो ।
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ।।2.48।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.48।। हे धनञ्जय तू आसक्ति का त्याग
कर के सिद्धि असिद्धि में सम होकर योग में
स्थित हुआ कर्मों को कर क्योंकि समत्व ही
योग कहा जाता है ।
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय ।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ।।2.49।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥

।।2.49।। बुद्धि योग(समता) की अपेक्षा
सकामकर्म दूर से (अत्यन्त) ही निकृष्ट है ।
अतः हे धनञ्जय तू बुद्धि (समता) का आश्रय
ले क्योंकि फल के हेतु बनने वाले अत्यन्त दीन हैं ।

द्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ।।2.50।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.50।। बुद्धि(समता) से युक्त मनुष्य यहाँ जीवित
अवस्था में ही पुण्य और पाप दोनों का त्याग कर
देता है । अतः तू योग(समता) में लग जा क्योंकि
योग ही कर्मों में कुशलता है ।
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ।।2.51।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.51।। समता युक्त मनीषी साधक कर्म जन्य
फल का त्याग करके जन्म रूप बन्धन से मुक्त
होकर निर्विकार पद को प्राप्त हो जाते हैं ।
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ।।2.51।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.51।। समता युक्त मनीषी साधक कर्म जन्य
फल का त्याग करके जन्म रूप बन्धन से मुक्त
होकर निर्विकार पद को प्राप्त हो जाते हैं ।

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ।।2.52।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.52।। जिस समय तेरी बुद्धि मोह रूपी दलदल
को तर जायगी उसी समय तू सुने हुए और सुनने
में आने वाले भोगों से वैराग्य को प्राप्त हो जायगा ।
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ।।2.53।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.53।। जिस काल में शास्त्रीय मत भेदों
से विचलित हुई तेरी बुद्धि निश्चल हो जायगी
और परमात्मा में अचल हो जायगी उस काल
में तू योग को प्राप्त हो जायगा ।
अर्जुन उवाच
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ।।2.54।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.54।। अर्जुन बोले हे केशव परमात्मा में
स्थित स्थिर बुद्धि वाले मनुष्य के क्या लक्षण
होते हैं वह स्थिर बुद्धि वाला मनुष्य कैसे बोलता
है कैसे बैठता है और कैसे चलता है ।

श्री भगवानुवाच
प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान् ।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ।।2.55।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.55।। श्रीभगवान् बोले हे पृथा नन्दन जिस
काल में साधक मनोगत सम्पूर्ण कामनाओं का
अच्छी तरह त्याग कर देता है और अपने आपसे
अपने आप में ही सन्तुष्ट रहता है उस काल में
वह स्थित प्रज्ञ कहा जाता है ।
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ।।2.56।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.56।। दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन
में उद्वेग नहीं होता और सुखों की प्राप्ति होने पर
जिसके मन में स्पृहा नहीं होती तथा जो राग भय
और क्रोध से सर्वथा रहित हो गया है वह मनन शील
मनुष्य स्थिर बुद्धि कहा जाता है ।
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् ।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।।2.57।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.57।। सब जगह आसक्ति रहित हुआ जो
मनुष्य उस शुभ अशुभ को प्राप्त करके न तो
अभि नन्दित होता है और न द्वेष करता है
उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित है ।
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।।2.58।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.58।। जिस तरह कछुआ अपने अङ्गों को
सब ओर से समेट लेता है ऐसे ही जिस काल में
यह कर्म योगी इन्द्रियों के विषयों से इन्द्रियों को
सब प्रकार से समेट लेता (हटा लेता) है तब उसकी
बुद्धि प्रतिष्ठित हो जाती है ।
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ।।2.59।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.59।। निराहारी (इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेवाले)
मनुष्य के भी विषय तो निवृत्त हो जाते हैं पर रस
निवृत्त नहीं होता । परन्तु इस स्थित प्रज्ञ मनुष्य
का तो रस भी परमात्मतत्त्व का अनुभव होने से
निवृत्त हो जाता है ।
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्िचतः ।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ।।2.60।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.60।। हे कुन्तीनन्दन (रस बुद्धि रहने से) यत्न
करते हुए विद्वान् मनुष्य की भी प्रमथन शील इन्द्रियाँ
उसके मन को बल पूर्वक हर लेती हैं ।

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।।2.61।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.61।। कर्म योगी साधक उन सम्पूर्ण इन्द्रियों
को वश में करके मेरे परायण होकर बैठे क्योंकि
जिसकी इन्द्रियाँ वश में हैं उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित है ।
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ।।2.62।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.62 2.63।। विषयों का चिन्तन करने वाले मनुष्य
की उन विषयों में आसक्ति पैदा हो जाती है । आसक्ति
से कामना पैदा होती है। कामना से क्रोध पैदा होता है ।
क्रोध होने पर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है । सम्मोह
से स्मृति भ्रष्ट हो जाती है । स्मृति भ्रष्ट होने पर बुद्धि का
नाश हो जाता है । बुद्धि का नाश होने पर मनुष्य का पतन
हो जाता है ।
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ।।2.63।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.62 2.63।। विषयों का चिन्तन करने वाले मनुष्य
की उन विषयों में आसक्ति पैदा हो जाती है । आसक्ति
से कामना पैदा होती है । कामना से क्रोध पैदा होता
है । क्रोध होने पर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है ।
सम्मोह से स्मृति भ्रष्ट हो जाती है । स्मृति भ्रष्ट होने
पर बुद्धि का नाश हो जाता है । बुद्धि का नाश होने
पर मनुष्य का पतन हो जाता है ।
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ।।2.64।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.64 2.65।। वशीभूत अन्तःकरण वाला कर्म
योगी साधक रागद्वेष से रहित अपने वश में की
हुई इन्द्रियों के द्वारा विषयों का सेवन करता हुआ
अन्तःकरण की प्रसन्नता को प्राप्त हो जाता है ।
प्रसन्नता प्राप्त होने पर साधक के सम्पूर्ण दुःखों
का नाश हो जाता है और ऐसे प्रसन्नचित्त वाले
साधक की बुद्धि निःसन्देह बहुत जल्दी परमात्मा
में स्थिर हो जाती है ।

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ।।2.65।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.64 2.65।। वशीभूत अन्तःकरण वाला कर्म
योगी साधक रागद्वेष से रहित अपने वश में की
हुई इन्द्रियों के द्वारा विषयों का सेवन करता हुआ
अन्तःकरण की प्रसन्नता को प्राप्त हो जाता है ।
प्रसन्नता प्राप्त होने पर साधक के सम्पूर्ण दुःखों
का नाश हो जाता है और ऐसे प्रसन्नचित्त वाले
साधक की बुद्धि निःसन्देह बहुत जल्दी परमात्मा
में स्थिर हो जाती है ।
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ।।2.66।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.66।। जिसके मन इन्द्रियाँ संयमित नहीं हैं
ऐसे मनुष्य की व्यवसायात्मिका बुद्धि नहीं होती ।
व्यवसायात्मिका बुद्धि न होने से उसमें कर्तव्यपरायणता
की भावना नहीं होती । ऐसी भावना न होने से उसको
शान्ति नहीं मिलती । फिर शान्ति रहित मनुष्य को
सुख कैसे मिल सकता है ।
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ।।2.67।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.67।। अपने अपने विषयों में विचरती हुई
इन्द्रियों में से एक ही इन्द्रिय जिस मन को
अपना अनुगामी बना लेती है वह अकेला मन
जल में नौका को वायु की तरह बुद्धि को हर लेता है ।
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।।2.68।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.68।। इसलिये हे महाबाहो जिस मनुष्य
की इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों से सर्वथा
निगृहीत (वशमें की हुई) हैं उसकी बुद्धि स्थिर है ।

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ।।2.69।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.69।। सम्पूर्ण मनुष्यों की जो रात
(परमात्मा से विमुखता) है उसमें संयमी
मनुष्य जागता है और जिसमें साधारण
मनुष्य जागते हैं (भोग और संग्रह में
लगे रहते हैं) वह तत्त्व को जानने
वाले मुनि की दृष्टि में रात है ।
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् ।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ।।2.70।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.70।। जैसे सम्पूर्ण नदियों का जल चारों ओर
से जल द्वारा परिपूर्ण समुद्र में आकर मिलता है पर
समुद्र अपनी मर्यादा में अचल प्रतिष्ठित रहता है ।
ऐसे ही सम्पूर्ण भोग पदार्थ जिस संयमी मनुष्य में
विकार उत्पन्न किये बिना ही उसको प्राप्त होते हैं
वही मनुष्य परम शान्ति को प्राप्त होता है भोगों
की कामना वाला नहीं ।
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः ।
निर्ममो निरहंकारः स शांतिमधिगच्छति ।।2.71।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.71।। जो मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओं का
त्याग करके निर्मम निरहंकार और निःस्पृह
होकर विचरता है वह शान्ति को प्राप्त होता है ।
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।
स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ।।2.72।।
॥ श्लोक का अर्थ ॥
।।2.72।। हे पृथा नन्दन यह ब्राह्मी स्थिति है ।
इसको प्राप्त होकर कभी कोई मोहित नहीं होता ।
इस स्थिति में यदि अन्तकाल में भी स्थित हो
जाय तो निर्वाण (शान्त) ब्रह्म की प्राप्ति हो जाती ।

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